झारखंड हाईकोर्ट ने एक वैवाहिक अपील को खारिज करते हुए साफ कहा है कि शादी से पहले उम्र और गंभीर आपराधिक सजा जैसे अहम तथ्यों को छिपाना पति के लिए मानसिक क्रूरता है। अदालत ने फैमिली कोर्ट, गुमला द्वारा दिया गया तलाक का आदेश सही ठहराया।
यह फैसला झारखंड हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने सुनाया, जिसमें जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस अरुण कुमार राय शामिल थे।
मामले की पृष्ठभूमि
मामले में पति और पत्नी की शादी 15 अप्रैल 2019 को गुमला जिले में हुई थी। पति ने फैमिली कोर्ट में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के तहत तलाक की याचिका दायर करते हुए आरोप लगाया कि शादी से पहले पत्नी ने अपनी असली उम्र छिपाई। पति के अनुसार, पत्नी की उम्र करीब 40 साल थी, लेकिन उसे 27 साल बताया गया।
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इसके साथ ही यह भी आरोप लगाया गया कि पत्नी ने अपने खिलाफ दर्ज एक हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा और जेल में बिताए गए समय की जानकारी नहीं दी। पति ने कोर्ट को बताया कि इन बातों का पता शादी के बाद चला, जिससे वैवाहिक रिश्ते में अविश्वास पैदा हुआ।
पत्नी का पक्ष
पत्नी ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उसने अपने आपराधिक मामले की जानकारी पहले ही पति और उसके परिवार को दे दी थी। उसका दावा था कि उसे झूठे मामले में फंसाया गया था और शादी आपसी सहमति से हुई थी।
पत्नी ने यह भी आरोप लगाया कि पति ने अपनी पिछली शादियों की जानकारी छिपाई और शादी के बाद उसे घर से निकाल दिया गया।
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फैमिली कोर्ट का फैसला
दोनों पक्षों के गवाहों से पूछताछ के बाद, पारिवारिक न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि पति ने मानसिक क्रूरता साबित कर दी है। न्यायालय ने पति के इस कथन को स्वीकार किया कि विवाह से पहले महत्वपूर्ण तथ्यों को छुपाया गया था और वैवाहिक संबंध भय, अविश्वास और बार-बार होने वाले झगड़ों से ग्रस्त था। इसी आधार पर न्यायालय ने तलाक का आदेश दिया।
इस फैसले से दुखी होकर पत्नी ने पारिवारिक न्यायालय अधिनियम की धारा 19 के तहत उच्च न्यायालय में अपील की, जो तथ्यों और कानून दोनों के आधार पर अपील की अनुमति देती है।
हाईकोर्ट की टिप्पणी
हाईकोर्ट ने अपील पर सुनवाई करते हुए कहा कि फैमिली कोर्ट के फैसले में कोई कानूनी या तथ्यात्मक गलती नहीं है। बेंच ने कहा,
“वैवाहिक संबंध विश्वास पर टिके होते हैं। यदि शादी से पहले ही महत्वपूर्ण तथ्य छिपाए जाएं, तो यह विश्वास को तोड़ देता है।”
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अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अपीलीय अदालत को तथ्यों और कानून दोनों पर दोबारा विचार करने का अधिकार है, लेकिन इस मामले में फैमिली कोर्ट का निष्कर्ष साक्ष्यों पर आधारित है।
अंतिम निर्णय
सभी तथ्यों और दलीलों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने पत्नी की अपील खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि मानसिक क्रूरता के आधार पर दिया गया तलाक का आदेश सही है और इसमें किसी हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है।
इसके साथ ही सभी लंबित अर्जियां भी निस्तारित कर दी गईं।
Case Title: Ranthi Kumari Devi vs Suresh Kumar Sahu
Case Number: F.A. No. 137 of 2022
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