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36 साल से अलग रह रहे दंपति का तलाक बरकरार, पत्नी को ₹40 लाख स्थायी गुजारा भत्ता देने का आदेश: झारखंड हाईकोर्ट

Shivam Y.

झारखंड हाईकोर्ट ने 36 वर्षों से अलग रह रहे दंपति के तलाक को बरकरार रखते हुए पत्नी के लिए ₹10 लाख की जगह ₹40 लाख एकमुश्त स्थायी गुजारा भत्ता निर्धारित किया।- संध्या देवी बनाम रजेश कुमार सिंह व अन्य

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36 साल से अलग रह रहे दंपति का तलाक बरकरार, पत्नी को ₹40 लाख स्थायी गुजारा भत्ता देने का आदेश: झारखंड हाईकोर्ट
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झारखंड हाईकोर्ट ने चितरंजन लोको मोटिव वर्क्स (CLW) में कार्यरत रजेश कुमार सिंह को उनकी पत्नी संध्या देवी से मिले तलाक के फैसले को सही ठहराया है। साथ ही, फैमिली कोर्ट द्वारा दी गई 10 लाख रुपये की गुजारा भत्ता राशि को बढ़ाकर 40 लाख रुपये कर दिया है। न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति संजय प्रसाद की खंडपीठ ने यह फैसला 19 जून, 2026 को सुनाया।

मामले की पृष्ठभूमि

दोनों की शादी 1984 में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुई थी और वे जामताड़ा जिले के मिहिजाम में साथ रह रहे थे। पति का कहना था कि उनकी पत्नी शुरू से ही गांव में रहने को राजी नहीं थीं और बिना बताए बार-बार अपने पिता के घर चली जाती थीं। उनके अनुसार, 1990 में पत्नी अपनी नवजात बेटी को लेकर हमेशा के लिए घर छोड़कर चली गईं और कई कोशिशों के बावजूद वापस नहीं लौटीं।

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दूसरी ओर, पत्नी का दावा बिल्कुल अलग था। उनका आरोप था कि उनके पति का सीमा देवी नाम की महिला से अवैध संबंध था, और दहेज को लेकर विवाद के बाद उन्हें घर से निकाल दिया गया। उन्होंने 1992 में पति के खिलाफ धारा 498A के तहत मामला दर्ज कराया था, जो बाद में सुलह से सुलझ गया। 2010 में गुजारा भत्ता का एक और मामला दायर हुआ, जिसमें समझौते के तहत पति ने 5,000 रुपये प्रति माह देने पर सहमति जताई थी, जो बाद में 6,000 रुपये कर दिया गया।

2019 में पति ने क्रूरता और परित्याग के आधार पर तलाक की अर्जी दाखिल की थी। फैमिली कोर्ट, जामताड़ा ने सितंबर 2022 में तलाक मंजूर कर लिया और 10 लाख रुपये गुजारा भत्ता तय किया। पत्नी ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए कहा कि क्रूरता और परित्याग के निष्कर्ष गलत हैं, और चूंकि उनके पति सरकारी कर्मचारी हैं, इसलिए तय की गई राशि बहुत कम है।

अदालत की टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की गवाहियों की बारीकी से जांच की, जिसमें दंपती की बेटी भी शामिल थी, जिसने अपनी मां के पक्ष का समर्थन किया। फिर भी, बेंच ने पाया कि पति का बयान जिसका समर्थन उसके भाई और दो पड़ोसियों ने किया ज्यादा सुसंगत था। साथ ही, पत्नी ने खुद स्वीकार किया था कि अगर पति उन्हें वापस लाना चाहें तो भी वह नहीं जाएंगी।

परित्याग के कानूनी पहलू को समझाते हुए कोर्ट ने कहा कि यह केवल घर छोड़ने भर का मामला नहीं है, बल्कि इसके लिए वैवाहिक संबंध को स्थायी रूप से खत्म करने की मंशा और निरंतरता जरूरी है। कोर्ट ने नोट किया कि पत्नी बेटी के जन्म के बाद 1990 के आसपास घर छोड़कर गई थीं और दोनों पक्ष 36 सालों से अलग रह रहे हैं।

इस रिश्ते को "बेजान" जैसा करार देते हुए बेंच ने कहा कि जब किसी विवाह में भावनात्मक या व्यावहारिक मूल्य ही न बचे, तो दोनों पक्षों को कानूनी तौर पर बंधे रहने के लिए मजबूर करना उनकी पीड़ा को और बढ़ाना ही होगा। ऐसी स्थिति में तलाक देना ही उचित ठहराया गया।

गुजारा भत्ता के मसले पर कोर्ट ने एक अहम कदम उठाया उसने चितरंजन लोको मोटिव वर्क्स के जनरल मैनेजर को पक्षकार बनाकर पति की वास्तविक सैलरी और रिटायरमेंट बेनिफिट्स की जानकारी मांगी। हलफनामे से पता चला कि पति, जो सीनियर टेक्नीशियन (लोको ड्राइवर) के पद पर हैं, लगभग 81,000 रुपये प्रति माह कमाते हैं और अगस्त 2026 में रिटायर होने वाले हैं। उनकी रिटायरमेंट बेनिफिट्स ग्रेच्युटी, लीव एनकैशमेंट और भविष्य निधि सहित लगभग 38 लाख रुपये होने का अनुमान है, साथ ही करीब 29,300 रुपये मासिक पेंशन भी मिलेगी।

बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला दिया, जिनमें राजनेश बनाम नेहा और हाल का राखी साधुखान बनाम राजा साधुखान मामला शामिल है। इन फैसलों में कहा गया है कि गुजारा भत्ता तय करते समय पत्नी के वैवाहिक जीवन के दौरान के रहन-सहन के स्तर का ध्यान रखना जरूरी है, ताकि वह आर्थिक तंगी में न पड़े। कोर्ट ने हिसाब लगाया कि पति की पेंशन और रिटायरमेंट राशि का एक हिस्सा भी पत्नी की संभावित बची जिंदगी के हिसाब से जोड़ा जाए, तो फैमिली कोर्ट द्वारा दी गई राशि कहीं कम पड़ती है।

फैसला

हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के तलाक के फैसले को बरकरार रखा, यह मानते हुए कि क्रूरता और परित्याग के तथ्य साबित हो चुके हैं। हालांकि, गुजारा भत्ता की राशि को 10 लाख से बढ़ाकर 40 लाख रुपये कर दिया गया। पति को यह राशि 12 महीनों के भीतर चार बराबर किस्तों में चुकानी होगी, जिसमें पहली किस्त एक महीने के भीतर देनी होगी।

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कोर्ट ने पत्नी को यह छूट भी दी है कि अगर भुगतान निर्देशानुसार नहीं होता, तो वह फिर से अदालत का रुख कर सकती हैं।

Case Details

Case Title: Sandhya Devi v. Rajesh Kumar Singh

Case Number: First Appeal No. 126 of 2022

Court: Jharkhand High Court

Judge: Justice Sujit Narayan Prasad and Justice Sanjay Prasad

Decision Date: June 19, 2026

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