Logo

धोखाधड़ी और डिजिटल ब्लैकमेलिंग से ली गई सहमति, सहमति नहीं है: मद्रास हाई कोर्ट ने सज़ा बरकरार रखी

Shivam Y.

मद्रास हाई कोर्ट ने सुजी उर्फ ​​कासी की सज़ा को बरकरार रखा और कहा कि धोखे, डराने-धमकाने और डिजिटल ब्लैकमेल से ली गई सहमति कानून की नज़र में वैध सहमति नहीं है। - सुजी उर्फ ​​कासी बनाम राज्य

Advertisement
धोखाधड़ी और डिजिटल ब्लैकमेलिंग से ली गई सहमति, सहमति नहीं है: मद्रास हाई कोर्ट ने सज़ा बरकरार रखी
Join Telegram

मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने सुजी @ कासी द्वारा दायर आपराधिक अपील खारिज करते हुए फास्ट ट्रैक महिला न्यायालय, नागरकोइल के दोषसिद्धि और सजा के आदेश को बरकरार रखा है। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करने में सफल रहा है और रिकॉर्ड पर ऐसा कोई कानूनी या तथ्यात्मक आधार नहीं है, जिसके कारण ट्रायल कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप किया जाए।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला वर्ष 2020 में सामने आया, जब आरोपी के खिलाफ पहले से चल रही एक अन्य आपराधिक जांच के दौरान पीड़िता ने CBCID के समक्ष अलग शिकायत दर्ज कराई। अभियोजन के अनुसार, आरोपी ने सबसे पहले पीड़िता से फेसबुक के माध्यम से संपर्क किया और उससे मित्रता बढ़ाई। इसके बाद उसने नौकरी दिलाने और विवाह करने का भरोसा देकर उसका विश्वास जीत लिया। कुछ समय बाद दोनों के बीच बातचीत निजी मैसेजिंग प्लेटफॉर्म पर होने लगी।

Advertisement

अभियोजन का आरोप था कि आरोपी ने इन भरोसों के आधार पर पीड़िता को कई बार मिलने के लिए राजी किया। मुलाकातों के दौरान उसने कथित रूप से उसकी इच्छा के विरुद्ध शारीरिक संबंध बनाए। इसके अलावा, उसने पीड़िता की जानकारी के बिना उसके निजी फोटो और वीडियो रिकॉर्ड कर लिए और बाद में उन्हें सोशल मीडिया पर सार्वजनिक करने की धमकी देकर लगातार मिलने और शारीरिक संबंध बनाने के लिए दबाव बनाया। अभियोजन का कहना था कि इसी डर और ब्लैकमेल के कारण पीड़िता लंबे समय तक उसका विरोध नहीं कर सकी।

शिकायत दर्ज होने के बाद CBCID ने अलग एफआईआर दर्ज की और जांच के दौरान इलेक्ट्रॉनिक उपकरण जब्त किए, फोरेंसिक रिपोर्ट प्राप्त की, गवाहों के बयान दर्ज किए तथा अन्य साक्ष्य एकत्र कर आरोपपत्र दाखिल किया।

मामले की सुनवाई के बाद नागरकोइल स्थित फास्ट ट्रैक महिला न्यायालय ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 376(2)(n) सहित अन्य संबंधित धाराओं के तहत दोषी ठहराते हुए प्राकृतिक जीवन की शेष अवधि तक आजीवन कारावास की सजा सुनाई। इस फैसले को चुनौती देते हुए आरोपी ने मद्रास हाईकोर्ट में अपील दायर की। अपील में उसने दावा किया कि संबंध आपसी सहमति से थे, शिकायत दर्ज करने में अनुचित देरी हुई और अभियोजन द्वारा प्रस्तुत इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य भरोसेमंद नहीं हैं।

अदालत की टिप्पणियां

डिवीजन बेंच ने रिकॉर्ड पर मौजूद मौखिक, दस्तावेजी और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों का स्वतंत्र मूल्यांकन करने के बाद कहा कि यह मामला केवल दो वयस्कों के बीच सहमति से बने संबंध का नहीं है। अदालत के अनुसार, अभियोजन के साक्ष्य यह दर्शाते हैं कि आरोपी ने कथित रूप से झूठे आश्वासन, भावनात्मक छल, धमकी और निजी सामग्री सार्वजनिक करने के भय का इस्तेमाल कर पीड़िता की स्वतंत्र इच्छा को प्रभावित किया।

पीठ ने कहा:

"साक्ष्य स्पष्ट रूप से स्थापित करते हैं कि यह कृत्य पीड़िता की इच्छा के विरुद्ध और उसकी वैध सहमति के बिना हुआ।"

अदालत ने यह भी दोहराया कि यदि पीड़िता की गवाही विश्वसनीय, स्वाभाविक और भरोसेमंद हो, तो केवल उसी के आधार पर भी दोषसिद्धि की जा सकती है और प्रत्येक मामले में स्वतंत्र पुष्टिकरण आवश्यक नहीं होता।

आरोपी की ओर से कहा गया कि पीड़िता के बयानों में विरोधाभास हैं, शिकायत दर्ज करने में देरी हुई और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य कानून के अनुरूप नहीं हैं। हाईकोर्ट ने इन सभी दलीलों को अस्वीकार करते हुए कहा कि ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों का सही मूल्यांकन किया था और अभियोजन ने शिकायत में हुई देरी का भी संतोषजनक स्पष्टीकरण दिया है।

अदालत का फैसला

सभी तथ्यों और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद मद्रास हाईकोर्ट ने आरोपी की अपील खारिज कर दी। अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करने में सफल रहा है और ट्रायल कोर्ट द्वारा दर्ज की गई दोषसिद्धि तथा सजा में किसी प्रकार के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।

Advertisement

अदालत ने कहा:

"अभियोजन पक्ष आरोपी का अपराध संदेह से परे सिद्ध करने में सफल रहा है और ट्रायल कोर्ट के दोषसिद्धि के निर्णय में कोई कानूनी या तथ्यात्मक त्रुटि नहीं है, जिसके कारण हस्तक्षेप किया जाए।"

इसी के साथ हाईकोर्ट ने फास्ट ट्रैक महिला न्यायालय, नागरकोइल द्वारा पारित दोषसिद्धि और सजा के आदेश की पुष्टि करते हुए आपराधिक अपील को खारिज कर दिया।

Case Details

Case Title: Suji @ Kasi v. State

Case Number: Crl.A(MD). No. 644 of 2023

Judges: Justice N. Anand Venkatesh and Justice K. Ramakrishnan

Decision Date: 14 July 2026

Advertisement

Take CourtBook Everywhere

Access your account on the go with our mobile app.

Get it on Google PlayDownload on the App Store
CourtBook Mobile App

Recommended Posts