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समझौते के बावजूद रेप FIR रद्द करने से राजस्थान हाई कोर्ट का इनकार, कहा- ऐसे अपराध समाज को प्रभावित करते हैं

Zaved Khan

राजस्थान हाई कोर्ट ने रेप के आरोप वाली FIR को केवल पक्षकारों के समझौते के आधार पर रद्द करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि ऐसे अपराध निजी विवाद नहीं हैं और समाज पर व्यापक प्रभाव डालते हैं। - Shankar Lal Meena v. State of Rajasthan & Anr.

समझौते के बावजूद रेप FIR रद्द करने से राजस्थान हाई कोर्ट का इनकार, कहा- ऐसे अपराध समाज को प्रभावित करते हैं
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राजस्थान हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में रेप के आरोप से जुड़ी FIR को रद्द करने से इनकार कर दिया है। अदालत के समक्ष यह दलील दी गई थी कि शिकायतकर्ता और आरोपी के बीच समझौता हो चुका है तथा शिकायतकर्ता अब मामले को आगे नहीं बढ़ाना चाहती। इसके बावजूद अदालत ने कहा कि ऐसे गंभीर आरोपों वाले मामलों को केवल समझौते के आधार पर समाप्त नहीं किया जा सकता।

यह आदेश न्यायमूर्ति अनूप कुमार धंध ने 19 मई 2026 को पारित किया।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता शंकर लाल मीणा ने हाई कोर्ट में याचिका दाखिल कर जयपुर के जवाहर सर्किल थाने में दर्ज FIR संख्या 63/2024 को रद्द करने की मांग की थी। FIR भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के तहत दर्ज की गई थी।

याचिका में कहा गया कि FIR में लगाए गए आरोप गलत हैं और बाद में शिकायतकर्ता ने आरोपी के पक्ष में समझौता कर लिया है। इसी आधार पर FIR और उससे जुड़ी कार्यवाही को समाप्त करने की मांग की गई।

सुनवाई के दौरान अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला दिया, जिनमें Gian Singh बनाम State of Punjab, Narinder Singh बनाम State of Punjab और State of M.P. बनाम Laxmi Narayan शामिल हैं।

अदालत ने कहा कि हाई कोर्ट के पास आपराधिक मामलों को रद्द करने की अंतर्निहित शक्ति जरूर है, लेकिन इसका इस्तेमाल सावधानी के साथ किया जाना चाहिए।

पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा,

“हत्या, बलात्कार और डकैती जैसे गंभीर अपराधों को केवल समझौते के आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता, क्योंकि इनका प्रभाव केवल संबंधित पक्षों तक सीमित नहीं होता बल्कि पूरे समाज पर पड़ता है।”

अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे अपराध निजी प्रकृति के नहीं माने जा सकते।

फैसला

हाई कोर्ट ने माना कि केवल समझौता हो जाने से FIR को रद्द नहीं किया जा सकता, विशेष रूप से तब जब मामला अभी जांच के चरण में हो।

अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता जांच अधिकारी के समक्ष अपना बयान दे सकती है और यदि आवश्यक हो तो मजिस्ट्रेट के समक्ष भी बयान दर्ज कराया जा सकता है। इसके बाद जांच अधिकारी कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र होगा।

इन्हीं टिप्पणियों के साथ अदालत ने याचिका का निस्तारण कर दिया और सभी लंबित आवेदन भी समाप्त कर दिए।

Case Details:

Case Title: Shankar Lal Meena v. State of Rajasthan & Anr.

Case Number: S.B. Criminal Miscellaneous Petition No. 1560/2024

Judge: Justice Anoop Kumar Dhand

Decision Date: May 19, 2026

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