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'कानून की गंभीर त्रुटि': राजस्थान हाई कोर्ट ने बिना नोटिस या सुनवाई के पारित राजस्व बोर्ड के आदेश को रद्द किया।

CB News Desk
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राजस्थान हाईकोर्ट ने बोर्ड ऑफ रेवेन्यू का वह आदेश रद्द कर दिया जो बिना नोटिस, बिना सुनवाई और विलंब माफी आवेदन पर निर्णय किए बिना पारित किया गया था। - वीरेन्द्र सिंह बनाम भूपेन्द्र सिंह राणावत एवं अन्य

'कानून की गंभीर त्रुटि': राजस्थान हाई कोर्ट ने बिना नोटिस या सुनवाई के पारित राजस्व बोर्ड के आदेश को रद्द किया।

राजस्थान हाईकोर्ट ने बोर्ड ऑफ रेवेन्यू (BoR) द्वारा पारित एक आदेश को रद्द करते हुए कहा है कि प्रभावित पक्षों को नोटिस जारी किए बिना और उन्हें सुनवाई का अवसर दिए बिना किसी पुनरीक्षण याचिका (Revision Petition) का निस्तारण नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने इस प्रक्रिया को “कानून की गंभीर त्रुटि” तथा “कानूनी प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग” बताया।

न्यायमूर्ति संजीत पुरोहित की एकलपीठ ने यह आदेश वीरेंद्र सिंह द्वारा दायर याचिका पर पारित किया।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला नागौर जिले की कृषि भूमि से जुड़े अधिकारों और स्थायी निषेधाज्ञा (Permanent Injunction) की मांग से संबंधित है। याचिकाकर्ता वीरेंद्र सिंह ने अतिरिक्त कलेक्टर, जायल के समक्ष खातेदारी अधिकारों की घोषणा और स्थायी निषेधाज्ञा के लिए वाद दायर किया था।

वाद के साथ दायर अंतरिम राहत आवेदन पर 17 अक्टूबर 2025 को ट्रायल कोर्ट ने यथास्थिति (Status Quo) बनाए रखने का आदेश दिया था। साथ ही संबंधित भूमि के हस्तांतरण या बिक्री पर भी रोक लगा दी गई थी।

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बाद में एक ऐसे व्यक्ति ने बोर्ड ऑफ रेवेन्यू के समक्ष पुनरीक्षण याचिका दायर की, जो मूल वाद में पक्षकार नहीं था। बोर्ड ऑफ रेवेन्यू ने ट्रायल कोर्ट का अंतरिम आदेश निरस्त कर दिया और संबंधित व्यक्ति को वाद में पक्षकार बनाने का निर्देश भी जारी कर दिया।

इसके बाद वीरेंद्र सिंह ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि बोर्ड ऑफ रेवेन्यू ने पुनरीक्षण याचिका पर प्रभावित पक्षों को नोटिस दिए बिना ही फैसला सुना दिया। यह भी दलील दी गई कि याचिका विलंब से दायर की गई थी और विलंब माफी (Condonation of Delay) का आवेदन लंबित होने के बावजूद पहले उसी पर निर्णय नहीं लिया गया।

दिलचस्प रूप से, प्रतिवादी पक्ष की ओर से उपस्थित अधिवक्ता ने भी स्वीकार किया कि बिना नोटिस जारी किए, बिना सुनवाई का अवसर दिए और विलंब माफी आवेदन का निस्तारण किए बिना पुनरीक्षण याचिका स्वीकार नहीं की जानी चाहिए थी।

न्यायालय ने इन दलीलों से सहमति जताई।

पीठ ने कहा, “जिस प्रकार से विवादित आदेश पारित किया गया, वह कानून के स्थापित और बुनियादी सिद्धांतों के विपरीत है।”

अदालत ने यह भी पाया कि बोर्ड ऑफ रेवेन्यू ने उस व्यक्ति को पक्षकार बनाने का निर्देश दे दिया, जबकि ट्रायल कोर्ट के समक्ष इस संबंध में कोई आवेदन लंबित ही नहीं था।

न्यायालय ने टिप्पणी की कि विवादित आदेश पुनरीक्षण याचिका में मांगी गई राहत से भी आगे बढ़कर पारित किया गया और यह “कानूनी प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग” प्रतीत होता है।

इन टिप्पणियों के साथ राजस्थान हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए बोर्ड ऑफ रेवेन्यू का 20 अप्रैल 2026 का आदेश रद्द कर दिया।

अदालत ने मामले को पुनः बोर्ड ऑफ रेवेन्यू के पास भेजते हुए निर्देश दिया कि पुनरीक्षण याचिका पर कानून के अनुसार और सभी संबंधित पक्षों को सुनवाई का पूरा अवसर देने के बाद नया निर्णय लिया जाए।

साथ ही न्यायालय ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता पुनरीक्षण याचिका की ग्राह्यता (Maintainability) सहित सभी कानूनी आपत्तियां बोर्ड ऑफ रेवेन्यू के समक्ष उठा सकेगा, जिन पर कानून के अनुसार विचार किया जाएगा।

हाईकोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि मामले की पुनः सुनवाई उस पीठ के समक्ष न हो जिसने विवादित आदेश पारित किया था।

Case Details

Case Title: Virendra Singh v. Bhupendra Singh Ranawat & Others

Case Number: S.B. Civil Writ Petition No. 12307/2026

Judge: Justice Sanjeet Purohit

Decision Date: 04 June 2026

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