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हस्ताक्षरित चेक से जुड़ी वैधानिक धारणा को खारिज करने के लिए ठोस साक्ष्य जरूरी, केवल ‘ब्लैंक सिक्योरिटी चेक’ का दावा पर्याप्त नहीं: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट

Shivam
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पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा कि हस्ताक्षरित चेक के मामले में केवल ‘ब्लैंक सिक्योरिटी चेक’ का दावा पर्याप्त नहीं है। आरोपी को वैधानिक धारणा को खंडित करने के लिए ठोस साक्ष्य प्रस्तुत करने होंगे। - नरेंद्र कुमार बनाम हरियाणा राज्य एवं अन्य

हस्ताक्षरित चेक से जुड़ी वैधानिक धारणा को खारिज करने के लिए ठोस साक्ष्य जरूरी, केवल ‘ब्लैंक सिक्योरिटी चेक’ का दावा पर्याप्त नहीं: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत 3.70 लाख रुपये के चेक अनादरण (Cheque Bounce) मामले में दोषसिद्ध व्यक्ति नरेंद्र कुमार को राहत देने से इनकार कर दिया है। न्यायमूर्ति सुमीत गोयल ने कहा कि जब आरोपी स्वयं चेक पर अपने हस्ताक्षर स्वीकार करता है, तब उसके पक्ष में केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि चेक एक खाली सुरक्षा चेक था। ऐसे दावे को साबित करने के लिए विश्वसनीय साक्ष्य भी प्रस्तुत करने होंगे।

अदालत ने इसी आधार पर दायर पुनरीक्षण याचिका को खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट और अपीलीय अदालत द्वारा पारित दोषसिद्धि एवं सजा के आदेशों को बरकरार रखा।

मामले की पृष्ठभूमि

शिकायतकर्ता के अनुसार, आरोपी ने दिसंबर 2015 में अपनी पत्नी के प्रसव संबंधी चिकित्सा खर्चों के लिए 1.50 लाख रुपये का मित्रतापूर्ण ऋण लिया था। इसके बाद जनवरी 2016 में नवजात बच्चे के इलाज के लिए 2.20 लाख रुपये और उधार लिए गए।

शिकायतकर्ता का कहना था कि कुल 3.70 लाख रुपये की देनदारी चुकाने के लिए आरोपी ने एक चेक जारी किया। हालांकि, बैंक में प्रस्तुत किए जाने पर चेक “फंड्स इनसफिशिएंट” टिप्पणी के साथ अनादरित हो गया। कानूनी नोटिस भेजे जाने के बावजूद भुगतान नहीं होने पर शिकायत दर्ज कराई गई।

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हाईकोर्ट में आरोपी की ओर से तर्क दिया गया कि चेक एक खाली हस्ताक्षरित सुरक्षा चेक था, जिसका दुरुपयोग किया गया। यह भी कहा गया कि शिकायतकर्ता कथित ऋण लेन-देन को स्वतंत्र साक्ष्यों से साबित नहीं कर सका।

आरोपी ने यह भी दावा किया कि पक्षकारों के बीच बाद में एक लाख रुपये में समझौता हो गया था और उसमें से 65 हजार रुपये का भुगतान भी किया जा चुका था।

अदालत ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। न्यायमूर्ति गोयल ने कहा कि चेक पर हस्ताक्षर स्वीकार किए जाने के बाद कानून शिकायतकर्ता के पक्ष में एक वैधानिक धारणा (Statutory Presumption) प्रदान करता है कि चेक किसी वैध देनदारी के निर्वहन के लिए जारी किया गया था।

पीठ ने कहा, “यह भार आरोपी पर था कि वह साबित करे कि संबंधित चेक किसी कानूनी देनदारी के बिना जारी किया गया था।”

अदालत ने पाया कि आरोपी अपने बचाव के समर्थन में कोई ठोस या विश्वसनीय साक्ष्य पेश नहीं कर सका। कथित समझौते को लेकर भी रिकॉर्ड पर कोई स्वतंत्र प्रमाण नहीं था। इसी तरह, आरोपी द्वारा हस्ताक्षरित देनदारी स्वीकार करने वाले दस्तावेज को भी वह चुनौती देने में विफल रहा।

सभी पक्षों की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपी वैधानिक धारणा को खंडित करने के लिए कोई संभावित बचाव स्थापित नहीं कर पाया। अदालत को निचली अदालतों के निष्कर्षों में कोई कानूनी त्रुटि या गंभीर विसंगति भी नहीं मिली।

इसके साथ ही हाईकोर्ट ने पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी और ट्रायल कोर्ट तथा अपीलीय अदालत द्वारा पारित दोषसिद्धि एवं सजा के आदेशों को बरकरार रखा।

Case Details

Case Title: Narender Kumar v. State of Haryana & Another

Case Number: CRR-1095-2025 (O&M)

Judge: Justice Sumeet Goel

Decision Date: May 25, 2026

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