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23 साल पुराने नाबालिग से दुष्कर्म मामले में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने दोष बरकरार रखा, लेकिन बीमारी और देरी के आधार पर सजा कम की

Shivam
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पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने नाबालिग दुष्कर्म मामले में दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए सजा को कम कर पहले से भुगती अवधि तक सीमित कर दिया। - धरमिंदर कुमार बनाम हरियाणा राज्य

23 साल पुराने नाबालिग से दुष्कर्म मामले में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने दोष बरकरार रखा, लेकिन बीमारी और देरी के आधार पर सजा कम की

पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने नाबालिग से जुड़े दुष्कर्म मामले में आरोपी की दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए सजा में राहत दी है। अदालत ने मामले की परिस्थितियों को देखते हुए सजा को पहले से भुगती गई अवधि तक सीमित कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह अपील धमेंद्र कुमार द्वारा दायर की गई थी, जिसमें उन्होंने वर्ष 2004 में पंचकूला की ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई सजा को चुनौती दी थी। ट्रायल कोर्ट ने उन्हें भारतीय दंड संहिता की धारा 363 और 376 के तहत दोषी ठहराया था।

अभियोजन के अनुसार, घटना के समय पीड़िता की उम्र लगभग 16 वर्ष थी। आरोप था कि आरोपी ने विवाह का झांसा देकर उसे अपने साथ ले गया और बाद में सुनसान स्थान पर उसके साथ दुष्कर्म किया।

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जांच के बाद आरोपी के खिलाफ आरोप तय हुए और ट्रायल कोर्ट ने उसे दोषी करार दिया।

अपीलकर्ता की ओर से दलील दी गई कि ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों का सही मूल्यांकन नहीं किया। यह भी कहा गया कि पीड़िता की उम्र साबित करने के लिए केवल स्कूल प्रमाणपत्र पर भरोसा किया गया, जबकि जन्म प्रमाणपत्र या मेडिकल जांच (ऑसिफिकेशन टेस्ट) नहीं कराई गई।

राज्य की ओर से इसका विरोध करते हुए कहा गया कि पीड़िता नाबालिग थी और उसका बयान विश्वसनीय है। यह भी तर्क दिया गया कि स्कूल रिकॉर्ड उम्र निर्धारण के लिए पर्याप्त साक्ष्य है और नाबालिग के मामले में सहमति का कोई महत्व नहीं होता।

उच्च न्यायालय ने माना कि पीड़िता की उम्र स्कूल रिकॉर्ड और गवाहों के बयान से सही तरीके से साबित हुई है। अदालत ने कहा कि ऐसे दस्तावेज, यदि घटना से पहले तैयार किए गए हों, तो उन पर भरोसा किया जा सकता है।

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अदालत ने स्पष्ट किया,

“यदि पीड़िता नाबालिग है, तो सहमति का प्रश्न कानूनी रूप से अप्रासंगिक हो जाता है।”

अदालत ने यह भी कहा कि पीड़िता का बयान सुसंगत और भरोसेमंद है तथा केवल उसके बयान के आधार पर भी दोषसिद्धि की जा सकती है।

चोट के निशान न मिलने और FIR दर्ज करने में थोड़ी देरी को भी अदालत ने मामले के लिए घातक नहीं माना। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में सामाजिक कारणों से देरी होना स्वाभाविक है।

रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद अदालत ने पाया कि अभियोजन ने आरोपों को संदेह से परे साबित किया है।

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अदालत ने ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई दोषसिद्धि को बरकरार रखा।

हालांकि, सजा के प्रश्न पर अदालत ने कुछ नरमी दिखाई। अदालत ने ध्यान दिया कि घटना को 23 वर्ष से अधिक समय बीत चुका है, आरोपी की स्वास्थ्य स्थिति (पक्षाघात) गंभीर है, और दोनों पक्ष अपने जीवन में आगे बढ़ चुके हैं।

इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने सजा को घटाकर आरोपी द्वारा पहले से भुगती गई अवधि तक सीमित कर दिया।

अपील का निस्तारण इसी के साथ कर दिया गया।

Case Details

Case Title: Dharminder Kumar vs State of Haryana

Case Number: CRA-S-1849-SB-2004

Judge: Justice Rupinderjit Chahal

Decision Date: 10 March 2026

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