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अटेंडेंस में छूट की सीमा से कम अटेंडेंस वाले छात्र रिव्यू पिटीशन के ज़रिए स्पेशल परीक्षा की मांग नहीं कर सकते: बॉम्बे हाई कोर्ट

Shivam
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बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक लॉ स्टूडेंट की उस रिव्यू पिटीशन को खारिज कर दिया, जिसमें उसने LL.M. सेमेस्टर परीक्षाओं से बाहर किए जाने को चुनौती दी थी। कोर्ट ने कहा कि वह अटेंडेंस की ज़रूरी शर्तों को पूरा करने में नाकाम रही और उसने रिव्यू के लिए कोई ठोस आधार भी नहीं बताया।

अटेंडेंस में छूट की सीमा से कम अटेंडेंस वाले छात्र रिव्यू पिटीशन के ज़रिए स्पेशल परीक्षा की मांग नहीं कर सकते: बॉम्बे हाई कोर्ट

बॉम्बे हाई कोर्ट की औरंगाबाद पीठ ने महाराष्ट्र नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (एमएनएलयू), छत्रपति संभाजीनगर की एक एलएलएम छात्रा द्वारा दायर समीक्षा याचिका को खारिज कर दिया है। छात्रा ने पहले दिए गए उस फैसले पर पुनर्विचार की मांग की थी, जिसमें उसे न्यूनतम उपस्थिति (Attendance) पूरी न करने के कारण सेमेस्टर परीक्षा में बैठने की अनुमति देने से इनकार कर दिया गया था।

न्यायमूर्ति विभा कंकणवाडी और न्यायमूर्ति अजीत बी. कड़ेठाणकर की खंडपीठ ने कहा कि समीक्षा याचिका के माध्यम से पहले से तय मुद्दों पर दोबारा बहस नहीं की जा सकती और याचिकाकर्ता समीक्षा के लिए आवश्यक कानूनी आधार स्थापित करने में विफल रही है।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता विश्वविद्यालय में एलएलएम पाठ्यक्रम की छात्रा थी। विश्वविद्यालय ने वर्ष 2020 के नियमों के तहत निर्धारित 75 प्रतिशत अनिवार्य उपस्थिति पूरी न करने के कारण उसे दूसरे सेमेस्टर की परीक्षा में बैठने से रोक दिया था।

इस निर्णय को चुनौती देते हुए छात्रा ने पहले रिट याचिका दायर की थी, जिसे 30 अप्रैल 2026 को हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया था। इसके बाद उसने समीक्षा याचिका दाखिल कर अदालत से पूर्व आदेश वापस लेने, उपस्थिति रिकॉर्ड की जांच कराने और उसके लिए विशेष परीक्षा आयोजित करने का अनुरोध किया।

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छात्रा ने स्वयं अदालत में पक्ष रखते हुए दावा किया कि उसकी उपस्थिति का सही आकलन नहीं किया गया। उसका कहना था कि विश्वविद्यालय द्वारा प्रस्तुत आंकड़े वास्तविक रिकॉर्ड से मेल नहीं खाते।

उसने यह भी आरोप लगाया कि कुछ अन्य छात्रों को अतिरिक्त उपस्थिति लाभ दिया गया, जबकि उसके मामले में ऐसा नहीं किया गया। इसके अलावा, उसने स्वास्थ्य संबंधी परिस्थितियों का हवाला देते हुए नए चिकित्सा दस्तावेज रिकॉर्ड पर लेने की मांग की।

याचिकाकर्ता का तर्क था कि विश्वविद्यालय को उसके मामले में उपस्थिति नियमों में उचित छूट देनी चाहिए थी।

विश्वविद्यालय की ओर से पेश अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि संस्थान की नीति के अनुसार केवल वही छात्र उपस्थिति में राहत पाने के पात्र होते हैं, जिन्होंने कम से कम 67 प्रतिशत उपस्थिति दर्ज की हो और अनुपस्थिति के लिए संतोषजनक चिकित्सीय कारण प्रस्तुत किए हों।

विश्वविद्यालय ने कहा कि याचिकाकर्ता इस न्यूनतम सीमा तक भी नहीं पहुंची थी। साथ ही, किसी भी प्रकार के भेदभाव या पक्षपात के आरोपों को सिरे से खारिज किया गया।

खंडपीठ ने समीक्षा अधिकार क्षेत्र की सीमाओं पर जोर देते हुए कहा कि समीक्षा याचिका को अपील का विकल्प नहीं बनाया जा सकता।

अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत गणना को स्वीकार कर लेने पर भी उसकी उपस्थिति लगभग 51 प्रतिशत तक ही पहुंचती है, जो 75 प्रतिशत अनिवार्य उपस्थिति और 67 प्रतिशत राहत सीमा दोनों से काफी कम है।

पीठ ने कहा, “किसी भी स्थिति में याचिकाकर्ता न तो 75 प्रतिशत उपस्थिति तक पहुंचती है और न ही 67 प्रतिशत की उस सीमा तक, जहां उपस्थिति में राहत पर विचार किया जा सकता है।”

अदालत ने यह भी पाया कि समीक्षा याचिका में उठाए गए कई मुद्दे पहले ही रिट याचिका में विस्तार से सुने और तय किए जा चुके थे। ऐसे मुद्दों को पुनः उठाना समीक्षा अधिकार क्षेत्र के दायरे में नहीं आता।

पीठ ने कुछ आरोपों को रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री से असमर्थित बताते हुए कहा कि समीक्षा याचिका में कई दलीलें केवल मामले को दोबारा सुनवाने का प्रयास प्रतीत होती हैं।

सभी पक्षों को सुनने के बाद बॉम्बे हाई कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता आदेश 47, सिविल प्रक्रिया संहिता के तहत समीक्षा के लिए आवश्यक कोई वैध आधार प्रस्तुत नहीं कर सकी है।

अदालत ने विशेष परीक्षा आयोजित कराने की मांग भी अस्वीकार कर दी और कहा कि नियमित परीक्षा प्रक्रिया पहले ही पूरी हो चुकी है।

हालांकि अदालत ने याचिकाकर्ता के कुछ आरोपों पर असंतोष व्यक्त किया, लेकिन यह देखते हुए कि वह अभी छात्रा है, उस पर कोई लागत (Cost) नहीं लगाई गई।

अंततः अदालत ने समीक्षा याचिका खारिज कर दी तथा रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि कार्यवाही में उल्लेखित एक सहपाठी छात्र का नाम गोपनीयता की दृष्टि से रिकॉर्ड से छिपाया जाए।

Case Details

Case Title: Student v. State of Maharashtra & Ors.

Case Number: Review Application (Civil) No. 95 of 2026 in Writ Petition No. 4881 of 2026

Judges: Justice Vibha Kankanwadi and Justice Ajit B. Kadethankar

Decision Date: 18 June 2026

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