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पहली शादी छिपाकर दूसरी शादी के आरोप में महिला को राहत नहीं, मां और भाई के खिलाफ FIR रद्द: बॉम्बे हाईकोर्ट

Shivam Y.

बॉम्बे हाई कोर्ट ने अपनी पहली शादी छिपाने की आरोपी महिला के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने से इनकार कर दिया, लेकिन ठोस आरोपों के अभाव में उसकी माँ और भाई के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द कर दिया। - स्वाति रावसाहेब मोरे (स्वाति सनी डिम्बर) और अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य

पहली शादी छिपाकर दूसरी शादी के आरोप में महिला को राहत नहीं, मां और भाई के खिलाफ FIR रद्द: बॉम्बे हाईकोर्ट
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बॉम्बे हाईकोर्ट ने पहली शादी छिपाकर दूसरी शादी करने और उससे जुड़े आपराधिक आरोपों के मामले में एक महिला के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने से इनकार कर दिया है। हालांकि, अदालत ने यह कहते हुए महिला की मां और भाई को राहत दे दी कि उनके खिलाफ एफआईआर में केवल सामान्य और अस्पष्ट आरोप लगाए गए हैं, जिनके आधार पर आपराधिक मुकदमा जारी नहीं रखा जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

यह याचिका स्वाति रावसाहेब मोरे, उनकी मां जयश्री मोरे और भाई दीपक मोरे ने दायर की थी। उन्होंने 22 जुलाई 2017 को पुणे के दत्तावाड़ी पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर और उसके आधार पर दाखिल चार्जशीट को रद्द करने की मांग की थी।

एफआईआर स्वाति की सास ने दर्ज कराई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया कि स्वाति ने एक ऑनलाइन मैट्रिमोनियल वेबसाइट के माध्यम से उनके बेटे से विवाह किया, जबकि उस समय उनकी पहली शादी कानूनी रूप से समाप्त नहीं हुई थी। शिकायत में धोखाधड़ी, पहली शादी छिपाने, धमकी, उगाही और अन्य आपराधिक आरोप भी लगाए गए थे।

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि यह मामला केवल वैवाहिक विवाद का परिणाम है और स्वाति द्वारा पहले अपने पति और ससुराल वालों के खिलाफ दर्ज कराए गए मामलों का जवाब देने के लिए यह एफआईआर दर्ज कराई गई है।

हाईकोर्ट की टिप्पणियां

न्यायमूर्ति रणजीतसिंह राजा भोंसले ने रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेजों और घटनाक्रम का अध्ययन करने के बाद कहा कि प्रथम दृष्टया यह दिखता है कि स्वाति ने अपनी पहली शादी के अस्तित्व के बावजूद दूसरी शादी की।

अदालत ने यह भी नोट किया कि रिकॉर्ड में ऐसे तथ्य हैं जिनसे यह जांच का विषय बनता है कि क्या उन्होंने स्वयं को अविवाहित बताकर दूसरी शादी की थी।

महिला की ओर से यह दलील दी गई कि 25 लाख रुपये की मांग केवल गुजारा भत्ता (एलिमनी) की मांग थी। इस पर अदालत ने टिप्पणी की,

"याचिकाकर्ता अब 25 लाख रुपये की मांग को गुजारा भत्ता नहीं बता सकती। मेरी राय में यह दलील पूरी तरह असंगत, अस्वीकार्य और आश्चर्यजनक है।"

अदालत ने कहा कि उपलब्ध सामग्री के आधार पर महिला के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला बनता है। इसलिए इस स्तर पर दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के तहत एफआईआर या आपराधिक कार्यवाही रद्द करने का कोई आधार नहीं बनता।

मां और भाई को मिली राहत

हाईकोर्ट ने पाया कि महिला की मां और भाई के खिलाफ एफआईआर में कोई विशिष्ट भूमिका नहीं बताई गई है। उनके विरुद्ध केवल सामान्य आरोप लगाए गए हैं और किसी विशेष आपराधिक कृत्य का उल्लेख नहीं है।

अदालत ने कहा,

"ऐसा अक्सर देखा जाता है कि सामान्य और अस्पष्ट आरोपों के आधार पर परिवार के अन्य सदस्यों को भी आपराधिक मामलों में शामिल कर लिया जाता है।"

अदालत ने माना कि उनके खिलाफ प्रथम दृष्टया कोई अपराध नहीं बनता और केवल रिश्तेदार होने के कारण मुकदमे में घसीटना उचित नहीं है।

अदालत का फैसला

बॉम्बे हाईकोर्ट ने याचिका आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए स्वाति मोरे की मां और भाई के खिलाफ दर्ज एफआईआर तथा उससे संबंधित चार्जशीट को रद्द कर दिया।

वहीं, स्वाति रावसाहेब मोरे की याचिका खारिज कर दी गई। अदालत ने स्पष्ट किया कि उनके और अन्य सह-आरोपियों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही कानून के अनुसार जारी रहेगी।

Case Details

Case Title: Swati Raosaheb More (Swati Sunny Dimber) & Others v. State of Maharashtra & Another

Case Number: Criminal Writ Petition No. 2578 of 2018

Judge: Justice Ranjitsinha Raja Bhonsale

Decision Date: 10 June 2026

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