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क्या धारा 44 के तहत मकान मालिक की विलंबित रिवीजन याचिका स्वीकार की जा सकती है? बॉम्बे हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण किराया कानून प्रश्न बड़ी बेंच को भेजा

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बॉम्बे हाईकोर्ट ने यह महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न बड़ी बेंच को भेजा है कि क्या महाराष्ट्र रेंट कंट्रोल एक्ट की धारा 44 के तहत मकान मालिक द्वारा दायर विलंबित रिवीजन याचिका में देरी माफ की जा सकती है। - लेफ्टिनेंट कर्नल सेवानिवृत्त। जयगोपाल नागराजन बनाम श्रीमती वासुदेव मारीवाला एवं अन्य।

क्या धारा 44 के तहत मकान मालिक की विलंबित रिवीजन याचिका स्वीकार की जा सकती है? बॉम्बे हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण किराया कानून प्रश्न बड़ी बेंच को भेजा

बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र रेंट कंट्रोल एक्ट, 1999 की धारा 44 से जुड़े एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न को बड़ी बेंच के विचारार्थ भेज दिया है। मामला इस प्रश्न पर केंद्रित है कि यदि कोई मकान मालिक 90 दिनों की निर्धारित अवधि के बाद रिवीजन याचिका दाखिल करता है, तो क्या रिवीजन प्राधिकरण उसके विलंब को माफ कर सकता है।

यह विवाद एक सेवानिवृत्त सेना अधिकारी द्वारा दायर याचिका से उत्पन्न हुआ, जिसकी रिवीजन याचिका केवल 12 दिन की देरी के कारण स्वीकार नहीं की गई थी।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता लेफ्टिनेंट कर्नल (सेवानिवृत्त) जयगोपाल नागराजन ने वर्ष 2008 में पुणे स्थित अपने फ्लैट को खाली कराने के लिए सक्षम प्राधिकारी के समक्ष बेदखली की कार्यवाही शुरू की थी। उन्होंने महाराष्ट्र रेंट कंट्रोल एक्ट की विशेष व्यवस्था के तहत कब्जा और अन्य राहतें मांगी थीं।

सक्षम प्राधिकारी ने अगस्त 2009 में उनकी याचिका खारिज कर दी। हालांकि प्राधिकारी ने उनकी वास्तविक आवश्यकता (बोना फाइड नीड) को स्वीकार किया, लेकिन आवश्यक प्रमाणपत्र प्रस्तुत न किए जाने के आधार पर आवेदन को अस्वीकार कर दिया गया।

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इसके बाद याचिकाकर्ता ने धारा 44 के तहत रिवीजन दायर की। चूंकि इसमें 12 दिन की देरी हुई थी, इसलिए देरी माफी आवेदन भी प्रस्तुत किया गया। अतिरिक्त आयुक्त ने यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि धारा 44 के तहत देरी माफ करने की शक्ति उपलब्ध नहीं है।

न्यायमूर्ति राजेश एस. पाटिल ने महाराष्ट्र के किराया कानूनों के इतिहास और सशस्त्र बलों के सदस्यों को दी गई विशेष कानूनी सुरक्षा का विस्तृत विश्लेषण किया।

अदालत ने कहा कि रक्षा सेवाओं से जुड़े कर्मियों को उनके सेवा दायित्वों और लगातार स्थानांतरण के कारण विशेष कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इसी कारण कानून में उनके लिए विशेष प्रावधान बनाए गए हैं।

अदालत ने निर्णय में उल्लेख किया:

“रक्षा सेवा कर्मियों की विशेष जिम्मेदारियों और कठिनाइयों के कारण उन्हें अन्य मकान मालिकों से अलग व्यवहार की आवश्यकता है।”

न्यायालय ने यह भी कहा कि पहले के जिन निर्णयों पर भरोसा किया गया था, वे मुख्य रूप से किरायेदारों द्वारा दायर मामलों से संबंधित थे। वर्तमान मामला एक ऐसे मकान मालिक का है जिसे कानून ने विशेष संरक्षण प्रदान किया है।

अदालत ने संकेत दिया कि यदि ऐसी स्थिति में देरी माफी का अधिकार पूरी तरह नकार दिया जाए तो विशेष श्रेणी के मकान मालिकों के लिए उपलब्ध कानूनी उपाय प्रभावित हो सकते हैं।

मामले में उठे कानूनी प्रश्न को महत्वपूर्ण मानते हुए हाईकोर्ट ने अंतिम निष्कर्ष देने के बजाय इसे बड़ी बेंच के समक्ष रखने का निर्णय लिया।

अदालत ने विचारार्थ निम्नलिखित प्रश्न निर्धारित किया:

“क्या महाराष्ट्र रेंट कंट्रोल एक्ट, 1999 की धारा 44 के तहत रिवीजन प्राधिकरण के पास यह शक्ति है कि वह 90 दिनों की अवधि के बाद मकान मालिक द्वारा दायर रिवीजन याचिका में हुई देरी को माफ कर सके?”

इसके साथ ही रजिस्ट्री को निर्देश दिया गया कि मामले के अभिलेख मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत किए जाएं ताकि इस प्रश्न पर विचार के लिए उपयुक्त बड़ी बेंच गठित की जा सके। अदालत ने अमीकस क्यूरी के रूप में सहायता देने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता गिरिश गोडबोले और अधिवक्ता कौस्तुभ थिप्से के योगदान की भी सराहना की।

Case Details

Case Title: Lt. Col. Retd. Jaigopal Nagarajan v. Mrs. Vasudev Mariwala & Anr.

Case Number: Writ Petition No. 502 of 2011

Judge: Justice Rajesh S. Patil

Decision Date: 8 June 2026

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