बॉम्बे हाई कोर्ट ने नाबालिग लड़कियों की तस्करी से जुड़े एक मामले में दोषसिद्ध महिला की पुनरीक्षण याचिका खारिज करते हुए निचली अदालतों के फैसले को बरकरार रखा है। अदालत ने कहा कि गवाहों के बयानों में मामूली विरोधाभास, एफआईआर दर्ज होने में हुई देरी या जांच संबंधी तकनीकी आपत्तियां, जब ठोस साक्ष्य मौजूद हों, तब अभियोजन के मामले को कमजोर नहीं कर सकतीं। अदालत ने यह भी कहा कि मानव तस्करी, विशेषकर नाबालिगों से जुड़े मामलों में पीड़ित अक्सर गहरे मानसिक आघात से गुजरते हैं और कई बार अदालत में गवाही देने की स्थिति में नहीं होते।
मामले की पृष्ठभूमि
मामला अगस्त 1996 में मुंबई में पुलिस द्वारा की गई एक छापेमारी से जुड़ा है। पुलिस को सूचना मिली थी कि एक इमारत में वेश्यावृत्ति का धंधा चलाया जा रहा है। छापेमारी के दौरान पुलिस को एक कमरे में दो नाबालिग लड़कियां मिलीं, जहां याचिकाकर्ता भी मौजूद थी।
जांच के बाद महिला के खिलाफ अनैतिक देह व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956 के तहत मामला दर्ज किया गया। ट्रायल कोर्ट ने उसे अधिनियम की धारा 6 के तहत दोषी ठहराते हुए दो वर्ष के कठोर कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई। सत्र न्यायालय ने भी इस फैसले को बरकरार रखा, जिसके बाद महिला ने बॉम्बे हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयानों में विरोधाभास हैं, एफआईआर दर्ज करने में देरी हुई, पीड़ित लड़कियों की अदालत में गवाही नहीं कराई गई तथा उनकी आयु निर्धारित करने के लिए ऑसिफिकेशन टेस्ट नहीं कराया गया।
न्यायमूर्ति एम.एम. साठाये ने इन सभी दलीलों को खारिज कर दिया।
अदालत ने कहा कि मानव तस्करी समाज और मानवता के खिलाफ गंभीर अपराध है और जब पीड़ित नाबालिग हों तो अपराध की गंभीरता और बढ़ जाती है। ऐसे मामलों में पीड़ित अक्सर भय और मानसिक आघात के कारण अदालत में गवाही देने से हिचकते हैं। इसलिए केवल इसी आधार पर अभियोजन का मामला कमजोर नहीं माना जा सकता।
अदालत ने कहा, "मानव तस्करी के मामलों में अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयानों में मामूली विरोधाभासों को घातक नहीं माना जा सकता।"
कोर्ट ने पाया कि स्वतंत्र पंच गवाह, पुलिस अधिकारियों की गवाही और पंचनामा सभी इस बात की पुष्टि करते हैं कि छापेमारी के दौरान दोनों नाबालिग लड़कियां याचिकाकर्ता के साथ उस स्थान पर मिली थीं।
ऑसिफिकेशन टेस्ट न होने की दलील पर अदालत ने कहा कि मेडिकल अधिकारी ने एक्स-रे और चिकित्सीय परीक्षण के आधार पर दोनों लड़कियों की आयु लगभग 13 से 14 वर्ष बताई थी। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णय का हवाला देते हुए हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हड्डियों की जांच (ऑसिफिकेशन) भी मूल रूप से एक्स-रे और डॉक्टर की विशेषज्ञ राय पर आधारित होती है।
अदालत ने कहा कि यदि आयु निर्धारण में दो वर्ष का अंतर भी मान लिया जाए, तब भी दोनों लड़कियां नाबालिग ही थीं।
इसके साथ ही अदालत ने माना कि जब नाबालिग लड़कियां वेश्यावृत्ति के लिए इस्तेमाल किए जा रहे स्थान पर याचिकाकर्ता के साथ मिलीं, तब कानून के तहत उसके खिलाफ वैधानिक अनुमान (Statutory Presumption) लागू होता है। चूंकि याचिकाकर्ता इस अनुमान को खंडित करने के लिए कोई साक्ष्य पेश नहीं कर सकी, इसलिए अभियोजन का मामला सिद्ध माना गया।
बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट और सत्र न्यायालय दोनों ने उपलब्ध साक्ष्यों का सही मूल्यांकन किया है और उनके निष्कर्षों में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं है।
इसी के साथ अदालत ने पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी, दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखा तथा ट्रायल कोर्ट को कानून के अनुसार याचिकाकर्ता की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कार्रवाई करने का निर्देश दिया।
Case Details
Case Title: Smt. Rita Dilip Ghosh v. State of Maharashtra
Case Number: Criminal Revision Application No. 227 of 2003
Judge: Justice M.M. Sathaye
Decision Date: July 3, 2026

















