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जहां चेक आंशिक भुगतान को नजरअंदाज करता है, वहां एनआई अधिनियम की धारा 138 लागू नहीं होती: केरल उच्च न्यायालय ने अपील खारिज की

Shivam Y.

केरल हाईकोर्ट ने कहा कि आंशिक भुगतान के बाद बिना संशोधन के पूरा चेक मान्य नहीं, इसलिए चेक बाउंस केस में आरोपी दोषी नहीं माना जा सकता। - दानिकुट्टी फिलिप बनाम जॉनीकुट्टी जे और केरल राज्य

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जहां चेक आंशिक भुगतान को नजरअंदाज करता है, वहां एनआई अधिनियम की धारा 138 लागू नहीं होती: केरल उच्च न्यायालय ने अपील खारिज की
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केरल हाईकोर्ट ने चेक बाउंस से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि यदि चेक की राशि का कुछ हिस्सा पहले ही चुका दिया गया हो और उसका उल्लेख (endorsement) नहीं किया गया, तो पूरा चेक अमान्य माना जाएगा। अदालत ने शिकायतकर्ता की अपील को खारिज करते हुए निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा।

यह फैसला Crl.A No. 1965 of 2025 में आया, जिसका निर्णय 26 मार्च, 2026 को न्यायमूर्ति ए. बदरुद्दीन द्वारा किया गया था।

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मामले की पृष्ठभूमि

मामला एक ₹10.90 लाख के ऋण से जुड़ा था, जिसे आरोपी ने कथित तौर पर चुकाने के लिए चेक जारी किया था। जब यह चेक बैंक में प्रस्तुत किया गया, तो वह अपर्याप्त धनराशि के कारण बाउंस हो गया।

हालांकि, रिकॉर्ड से पता चला कि चेक प्रस्तुत करने से पहले आरोपी ने दो बार में करीब ₹3.90 लाख की राशि चुका दी थी। इसके बावजूद शिकायतकर्ता ने पूरे ₹10.90 लाख की राशि का दावा करते हुए मामला दर्ज कराया।

न्यायमूर्ति ए. बदरुद्दीन ने सुनवाई के दौरान कहा कि कानून के अनुसार चेक उसी राशि के लिए मान्य होता है जो वास्तव में देनदारी के रूप में बाकी हो।

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा:

“यदि चेक की राशि का कोई हिस्सा पहले ही चुका दिया गया है, तो उस भुगतान को चेक पर दर्ज करना आवश्यक है। अन्यथा, चेक पूरी राशि का प्रतिनिधित्व नहीं करता।”

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में धारा 138 (Negotiable Instruments Act) तभी लागू होगी, जब चेक वास्तविक और कानूनी रूप से बकाया राशि को दर्शाता हो।

अदालत ने कहा कि आंशिक भुगतान के बाद यदि चेक को बिना संशोधन (endorsement) के दोबारा प्रस्तुत किया जाता है, तो वह “कानूनी रूप से देनदारी” का सही प्रतिनिधित्व नहीं करता।

इस मामले में शिकायतकर्ता ने न तो चेक पर भुगतान का उल्लेख किया और न ही शिकायत में इसका खुलासा किया। इसलिए, अदालत ने माना कि पूरा दावा ही कानून के अनुरूप नहीं था।

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अंत में, अदालत ने कहा कि मजिस्ट्रेट द्वारा आरोपी को बरी करने का फैसला पूरी तरह उचित था।

“जब चेक वास्तविक देनदारी को नहीं दर्शाता, तब धारा 138 के तहत अपराध स्थापित नहीं किया जा सकता,” अदालत ने कहा।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने अपील खारिज कर दी और निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा।

Case Details

Case Title: Danikutti Philip v. Johnykutty J & State of Kerala

Case Number: Crl.A No. 1965 of 2025

Judge: Justice A. Badharudeen

Decision Date: 26 March 2026

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