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कोविड प्रोटोकॉल उल्लंघन मामला: साक्ष्यों के अभाव में बॉम्बे हाईकोर्ट ने डॉक्टर के खिलाफ दर्ज FIR को किया रद्द

Shivam
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बॉम्बे हाईकोर्ट ने कोविड नियम उल्लंघन मामले में डॉक्टर के खिलाफ FIR रद्द की, कहा प्रथम दृष्टया कोई अपराध नहीं बनता और साक्ष्य अपर्याप्त हैं। - डॉ. भगवानदास शंकरदास ज़ावर बनाम महाराष्ट्र राज्य

कोविड प्रोटोकॉल उल्लंघन मामला: साक्ष्यों के अभाव में बॉम्बे हाईकोर्ट ने डॉक्टर के खिलाफ दर्ज FIR को किया रद्द

नागपुर खंडपीठ में सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण फैसले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने कोविड-19 नियमों के उल्लंघन से जुड़े एक मामले में डॉक्टर के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द कर दिया। अदालत ने पाया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस आधार नहीं है जिससे प्रथम दृष्टया अपराध बनता हो।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला डॉ. भगवानदास शंकरदास ज़ावर बनाम महाराष्ट्र राज्य से जुड़ा है, जिसमें आवेदक एक डॉक्टर हैं। उनके खिलाफ वर्ष 2020 में कोविड-19 महामारी के दौरान FIR दर्ज की गई थी। आरोप था कि उन्होंने प्रशासन के निर्देशों का पालन नहीं किया और संक्रमण फैलने का खतरा पैदा किया।

शिकायत के अनुसार, एक मेडिकल अधिकारी को निर्देश दिया गया था कि वे आवेदक को कोविड केयर सेंटर लेकर जाएं। जब टीम उनके घर और अस्पताल पहुंची, तो वे वहां नहीं मिले। बाद में जानकारी मिली कि डॉक्टर स्वयं ही कोविड सेंटर पहुंच गए थे, जिसके बाद रिपोर्ट दर्ज की गई।

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न्यायमूर्ति उर्मिला जोशी-फाल्के ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि आवेदक बाद में कोविड सेंटर पहुंच गए थे।

अदालत ने कहा,

“यह मामला नहीं है कि आवेदक ने पूरी तरह से आदेश का उल्लंघन किया। उपलब्ध साक्ष्यों से पता चलता है कि उन्होंने बाद में निर्देशों का पालन किया।”

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि किसी भी व्यक्ति के संक्रमित होने या संक्रमण फैलाने का कोई आरोप या साक्ष्य सामने नहीं आया।

न्यायालय ने भारतीय दंड संहिता की धारा 188 (सरकारी आदेश की अवहेलना), 269 और 270 (संक्रमण फैलाने से जुड़े अपराध) के तत्वों का विश्लेषण करते हुए पाया कि इन धाराओं के आवश्यक तत्व इस मामले में लागू नहीं होते।

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कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय हरियाणा राज्य बनाम भजन लाल के सिद्धांतों का हवाला दिया और कहा कि जब FIR के आरोप अपने आप में अपराध नहीं बनाते, तो ऐसे मामलों में कार्यवाही जारी रखना उचित नहीं है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि जांच के दौरान भी ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे यह साबित हो कि आवेदक ने जानबूझकर या लापरवाही से संक्रमण फैलाने का कार्य किया हो।

सभी तथ्यों और रिकॉर्ड के आधार पर अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि आवेदक के खिलाफ कोई प्रथम दृष्टया मामला नहीं बनता।

अदालत ने आदेश दिया कि:

“FIR को रद्द और निरस्त किया जाता है, जहां तक यह आवेदक से संबंधित है।”

इसके साथ ही आपराधिक आवेदन को स्वीकार करते हुए मामला समाप्त कर दिया गया।

Case Details:

Case Title: Dr. Bhagwandas Shankardas Zawar vs State of Maharashtra

Case Number: Criminal Application (APL) No. 693 of 2020

Judge: Justice Urmila Joshi-Phalke

Decision Date: 08 April 2026

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