Logo

26-28 सप्ताह की गर्भवती 15 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता को गर्भपात की अनुमति, दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा- अनुच्छेद 21 के तहत प्रजनन संबंधी निर्णय का अधिकार मौलिक अधिकार

Shivam Y.

दिल्ली हाई कोर्ट ने अनुच्छेद 21 और AIIMS की मेडिकल राय (जिसमें उसकी मानसिक सेहत का ज़िक्र था) के आधार पर, रेप की शिकार 15 साल की लड़की को अपनी 26-28 हफ़्ते की प्रेग्नेंसी को मेडिकल तरीके से खत्म करने की इजाज़त दे दी। - माइनर R (अपने पिता R के ज़रिए) बनाम दिल्ली राज्य (NCT) और अन्य

26-28 सप्ताह की गर्भवती 15 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता को गर्भपात की अनुमति, दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा- अनुच्छेद 21 के तहत प्रजनन संबंधी निर्णय का अधिकार मौलिक अधिकार
Join Telegram

दिल्ली हाईकोर्ट ने 15 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता को 26-28 सप्ताह के गर्भ का चिकित्सकीय समापन (Medical Termination of Pregnancy) कराने की अनुमति दे दी है। अदालत ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में नाबालिग को उसकी इच्छा के विरुद्ध गर्भ जारी रखने के लिए मजबूर करना उसके मानसिक स्वास्थ्य और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के विपरीत होगा। न्यायमूर्ति मिनी पुष्करणा ने एम्स (AIIMS) की मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट पर भरोसा करते हुए यह आदेश पारित किया।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिका 15 वर्षीय नाबालिग की ओर से उसके पिता ने दायर की थी। याचिका में बताया गया कि नाबालिग दुष्कर्म की पीड़िता है और उसकी गर्भावस्था 26-28 सप्ताह की हो चुकी है। चूंकि मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) अधिनियम के तहत निर्धारित समय-सीमा पार हो चुकी थी, इसलिए गर्भपात की अनुमति के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया।

याचिकाकर्ता ने कहा कि गर्भ जारी रहने से नाबालिग को गंभीर मानसिक आघात पहुंचेगा। मामले की जांच के बाद एम्स की मेडिकल बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि गर्भ जारी रहने से बच्ची के मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका है और वह चिकित्सकीय रूप से गर्भसमापन की प्रक्रिया के लिए फिट है। दिल्ली सरकार ने भी अदालत को बताया कि मेडिकल बोर्ड की राय के बाद उसे गर्भपात कराने पर कोई आपत्ति नहीं है।

न्यायमूर्ति मिनी पुष्करणा ने कहा कि यद्यपि एमटीपी अधिनियम सामान्यतः 24 सप्ताह से अधिक की गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति नहीं देता, लेकिन संवैधानिक अदालतें विशेष परिस्थितियों में अपने असाधारण अधिकारों का प्रयोग कर सकती हैं, खासकर तब जब मामला दुष्कर्म पीड़िता नाबालिग का हो।

अदालत ने दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रजनन संबंधी निर्णय लेने का अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

अदालत ने कहा, "दुष्कर्म से जुड़े मामलों में संवैधानिक अदालतें गर्भसमापन की अनुमति देने के लिए अपने असाधारण अधिकार क्षेत्र का प्रयोग कर सकती हैं, क्योंकि ऐसे मामलों में नाबालिग को गंभीर मानसिक आघात और पीड़ा का सामना करना पड़ता है।"

सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्णय का हवाला देते हुए अदालत ने यह भी कहा कि "किसी भी महिला, विशेषकर नाबालिग, को उसकी स्पष्ट इच्छा के विरुद्ध पूर्ण अवधि तक गर्भ धारण करने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए।"

सभी तथ्यों, नाबालिग और उसके पिता की इच्छा तथा एम्स मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार कर ली।

अदालत ने निर्देश दिया कि नाबालिग का गर्भसमापन एम्स, नई दिल्ली में विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम द्वारा एमटीपी अधिनियम और संबंधित नियमों के अनुसार किया जाए। साथ ही भ्रूण के ऊतकों (Fetal Tissue) को डीएनए जांच के लिए सुरक्षित रखने का निर्देश भी दिया गया, ताकि लंबित आपराधिक मामले में आवश्यकता पड़ने पर उनका उपयोग किया जा सके।

अदालत ने यह भी आदेश दिया कि गर्भसमापन, अस्पताल में भर्ती रहने और ऑपरेशन के बाद होने वाले सभी चिकित्सा खर्च दिल्ली सरकार वहन करेगी। यदि प्रक्रिया के दौरान शिशु जीवित जन्म लेता है, तो उसे आवश्यक चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराई जाएगी और बाल कल्याण समिति (CWC) को सूचना दी जाएगी।

यदि नाबालिग और उसके पिता की इच्छा हो, तो ऐसे बच्चे को कानून के अनुसार गोद देने की प्रक्रिया अपनाई जाएगी।

इन निर्देशों के साथ हाईकोर्ट ने याचिका का निस्तारण कर दिया।

Case Details

Case Title: Minor R (Through Her Father R) v. State NCT of Delhi & Another

Case Number: W.P. (CRL) 1804/2026

Judge: Hon'ble Ms. Justice Mini Pushkarna

Decision Date: 24 June 2026

Recommended Posts

Latest News