इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में उस व्यक्ति की हत्या की दोषसिद्धि को बरकरार रखा है, जिसे अपनी गर्भवती पत्नी को आग के हवाले करने का दोषी ठहराया गया था। हालांकि अदालत ने सजा के मुद्दे पर राहत देते हुए उम्रकैद को 20 वर्ष के निश्चित कठोर कारावास में परिवर्तित कर दिया।
न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने कहा कि मामले में मृतका का मृत्यु पूर्व बयान (डाइंग डिक्लेरेशन) विश्वसनीय और कानूनी रूप से स्वीकार्य है तथा उसी के आधार पर दोषसिद्धि कायम रखी जा सकती है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला नवंबर 2010 का है और उत्तर प्रदेश के सीतापुर का है। अपील करने वाले मनीष पर आरोप था कि उसने काशीराम कॉलोनी के एक घर में अपनी पत्नी रुचि पर केरोसीन तेल डालकर उसे आग लगा दी थी। आग लगाने के बाद, उसने कथित तौर पर बाहर से दरवाज़ा बंद कर दिया था। आठ महीने की गर्भवती रुचि मदद के लिए चिल्लाने में कामयाब रही। पड़ोसियों ने इकट्ठा होकर उसे बचाया। उसे सीतापुर के ज़िला अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ उसने लगभग 23 दिनों तक अपनी जान बचाने के लिए संघर्ष किया, लेकिन 21 दिसंबर 2010 को चोटों के कारण उसकी मौत हो गई। उसके पेट में पल रहा बच्चा भी नहीं बच सका।
रुचि की माँ, माया देवी ने शिकायत दर्ज कराई कि उनका दामाद अतिरिक्त दहेज के तौर पर 50,000 रुपये की मांग कर रहा था और मांग पूरी न होने पर उनकी बेटी को परेशान कर रहा था। 28 जनवरी 2011 को FIR दर्ज की गई। सीतापुर के एडिशनल सेशंस जज ने फरवरी 2019 में मनीष को IPC की धारा 302 के तहत दोषी ठहराया और उसे उम्रकैद की सज़ा सुनाई। इसके बाद उसने हाई कोर्ट में अपील की।
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि मृत्यु पूर्व बयान प्रश्न-उत्तर के प्रारूप में दर्ज नहीं किया गया था और इसलिए उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता। यह भी कहा गया कि गंभीर रूप से झुलसी हुई महिला के लिए स्पष्ट और भरोसेमंद बयान देना संभव नहीं था।
अदालत ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। पीठ ने कहा कि कानून में ऐसा कोई अनिवार्य प्रावधान नहीं है कि मृत्यु पूर्व बयान केवल प्रश्न-उत्तर के रूप में ही दर्ज किया जाए।
अदालत ने कहा, “डाइंग डिक्लेरेशन दर्ज करने के लिए किसी विशेष प्रारूप की आवश्यकता नहीं है।” साथ ही यह भी पाया गया कि बयान एक कार्यपालक मजिस्ट्रेट द्वारा दर्ज किया गया था और उससे पहले डॉक्टर ने मृतका को बयान देने के लिए मानसिक रूप से सक्षम बताया था।
पीठ ने मामले के तथ्यों का विश्लेषण करते हुए कहा कि मृत्यु पूर्व बयान के अनुसार आरोपी ने पहले मृतका को दूसरे कमरे में ले जाकर उसके ऊपर मिट्टी का तेल डाला, फिर आग लगा दी और बाहर से दरवाजा बंद कर दिया।
अदालत ने कहा कि यह आचरण केवल क्रूरता नहीं दर्शाता बल्कि इससे आरोपी की मंशा भी स्पष्ट होती है। फैसले में कहा गया कि मृतका की गर्भावस्था के बारे में आरोपी को पूरी जानकारी थी और उसने उसकी असहाय स्थिति का लाभ उठाया।
बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि मौत सीधे जलने से नहीं बल्कि बाद में विकसित हुए सेप्टीसीमिया (संक्रमण) के कारण हुई, इसलिए अपराध को हत्या नहीं माना जाना चाहिए।
हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि सेप्टीसीमिया जलने की गंभीर चोटों का स्वाभाविक परिणाम था और मृत्यु का वास्तविक कारण वही चोटें थीं जो आरोपी के कथित कृत्य से हुई थीं।
पीठ ने कहा, “इरादतन पहुंचाई गई जलने की चोटें अंततः घातक साबित हुईं।”
दोषसिद्धि बरकरार रखने के बावजूद अदालत ने सजा के पहलू पर अलग दृष्टिकोण अपनाया। न्यायालय ने आरोपी की उम्र, लगभग 15 वर्षों की जेल अवधि, जेल में अच्छे आचरण और उसके सुधार की संभावना को ध्यान में रखा।
पीठ ने कहा, “दंड का सिद्धांत प्रतिशोध पर आधारित नहीं हो सकता।” अदालत ने माना कि लंबे कारावास के दौरान आरोपी के व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन दिखाई दिया है और समाज में पुनर्वास की संभावना को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हत्या के अपराध में आरोपी मनीष की दोषसिद्धि को बरकरार रखा। हालांकि उम्रकैद की सजा को संशोधित करते हुए उसे बिना किसी छूट के 20 वर्ष के निश्चित कठोर कारावास में बदल दिया।
इस प्रकार अपील आंशिक रूप से स्वीकार की गई।
Case Details
Case Title: Manish v. State of Uttar Pradesh
Case Number: Criminal Appeal No. 565 of 2019
Judges: Justice Rajesh Singh Chauhan and Justice Indrajeet Shukla
Decision Date: June 3, 2026

















