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इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला: बिना लिखित किरायानामा भी मकान मालिक की अर्जी सुन सकता है रेंट अथॉरिटी

Vivek G.
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केनरा बैंक शाखा कार्यालय एवं अन्य। बनाम अशोक कुमार @ हीरा सिंह, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि बिना लिखित किरायानामा या सूचना के अभाव में भी मकान मालिक रेंट अथॉरिटी में अर्जी दे सकता है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला: बिना लिखित किरायानामा भी मकान मालिक की अर्जी सुन सकता है रेंट अथॉरिटी

किरायेदारी कानून को लेकर लंबे समय से चले आ रहे भ्रम पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बड़ा और स्पष्ट फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि यदि किरायेदारी लिखित समझौते के बिना भी है, तो केवल इसी आधार पर मकान मालिक को रेंट अथॉरिटी के समक्ष जाने से नहीं रोका जा सकता। यह फैसला उत्तर प्रदेश रेगुलेशन ऑफ अर्बन प्रिमाइसेज टेनेंसी एक्ट, 2021 की व्याख्या को लेकर दाखिल कई याचिकाओं पर एक साथ दिया गया।

Background of Case

कोर्ट के समक्ष कुल छह मामले आए थे, जिनमें बैंक, निजी संस्थान और व्यक्तिगत मकान मालिक शामिल थे। सभी मामलों में एक समान सवाल था-क्या रेंट अथॉरिटी उस स्थिति में मकान मालिक की अर्जी सुन सकती है, जब न तो किरायानामा लिखा गया हो और न ही किरायेदारी का विवरण रेंट अथॉरिटी को दिया गया हो?

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निचली अदालतों और रेंट अथॉरिटीज़ में इस मुद्दे पर अलग-अलग व्याख्याएँ सामने आ रही थीं, जिसके कारण बड़ी संख्या में याचिकाएँ हाईकोर्ट पहुंचीं।

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Court Observation

जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल की पीठ ने पूरे किरायेदारी कानून के इतिहास, 1972 के पुराने कानून और 2021 के नए कानून-दोनों का विस्तृत विश्लेषण किया।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 2021 का नया कानून मॉडल टेनेंसी एक्ट से अलग है। मॉडल कानून में जहां जानकारी न देने पर सख्त परिणाम तय थे, वहीं उत्तर प्रदेश के कानून में ऐसा कोई दंडात्मक प्रावधान नहीं जोड़ा गया।

पीठ ने टिप्पणी की,

“कानून में किसी प्रावधान के पालन न करने पर यदि कोई दंड या परिणाम तय नहीं किया गया है, तो उसे अनिवार्य नहीं माना जा सकता।”

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कोर्ट ने यह भी कहा कि ‘shall’ शब्द का प्रयोग अपने आप में किसी प्रावधान को अनिवार्य नहीं बना देता। इसका उद्देश्य केवल किरायेदारी के संबंध को प्रमाणित करना है, न कि मकान मालिक के अधिकारों को खत्म करना।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि-

• यदि कानून में गैर-पालन के परिणाम स्पष्ट नहीं हैं

• और इससे निर्दोष पक्ष को गंभीर नुकसान होता है

तो ऐसे प्रावधानों को निर्देशात्मक (directory) माना जाएगा, न कि अनिवार्य।

कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि 2021 का कानून मकान मालिक और किरायेदार—दोनों के हितों का संतुलन बनाने के लिए लाया गया था, न कि किसी एक पक्ष को पूरी तरह वंचित करने के लिए।

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Decision

इन सभी तथ्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने साफ तौर पर फैसला दिया कि-

• केवल इस वजह से कि किरायेदारी लिखित नहीं है या रेंट अथॉरिटी को सूचना नहीं दी गई, मकान मालिक की अर्जी खारिज नहीं की जा सकती।

• रेंट अथॉरिटी को ऐसे मामलों में भी अधिकार क्षेत्र प्राप्त है, बशर्ते मकान मालिक–किरायेदार संबंध विवादित न हो।

• सूचना देना सहायक प्रक्रिया है, लेकिन अधिकार छीनने का आधार नहीं।

इसी के साथ सभी याचिकाओं का निस्तारण कर दिया गया।

Case Title: Canara Bank Branch Office & Anr. vs Ashok Kumar @ Heera Singh

Case No.: Matters Under Article 227 No. 626 of 2024 (with connected cases)

Case Type: Article 227 / Writ & SCC Revision

Decision Date: 16 December 2025

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