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आपसी समझौते के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आपराधिक मामला किया खत्म, समन और रिवीजन आदेश रद्द

CB News Desk

रक्षाराम तिवारी और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, प्रधान सचिव (गृह), लखनऊ और अन्य - पक्षों के बीच सौहार्दपूर्ण समझौता होने के बाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने धारा 482 सीआरपीसी के तहत गोंडा आपराधिक मामले को रद्द कर दिया; इसमें कोई जनहित शामिल नहीं है।

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आपसी समझौते के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आपराधिक मामला किया खत्म, समन और रिवीजन आदेश रद्द
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इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने सोमवार को एक आपराधिक मामले में बड़ी राहत देते हुए कहा कि जब पक्षकार आपसी समझौते से विवाद सुलझा लेते हैं, तो ऐसे मामलों को आगे खींचने का कोई औचित्य नहीं रह जाता। कोर्ट ने इसी आधार पर शिकायत केस से जुड़ी पूरी कार्यवाही को समाप्त कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला रक्षाराम तिवारी और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य से जुड़ा है, जिसमें आवेदकों ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के तहत हाईकोर्ट का रुख किया था। उनकी मांग थी कि गोंडा की निचली अदालत द्वारा 1 अक्टूबर 2022 को जारी समन आदेश और 5 जुलाई 2023 को पारित रिवीजन आदेश को रद्द किया जाए।

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यह शिकायत केस हेमंत शुक्ला द्वारा दर्ज कराया गया था, जिसमें भारतीय दंड संहिता की धाराएं 323 (मारपीट), 427 (नुकसान पहुंचाना) और 504 (जानबूझकर अपमान) लगाई गई थीं। मामला सिविल जज (जूनियर डिवीजन), कोर्ट नंबर-8, गोंडा में लंबित था।

सुनवाई के दौरान कोर्ट को बताया गया कि हाईकोर्ट के मेडिएशन और सुलह केंद्र में दोनों पक्षों के बीच समझौता हो चुका है। 28 अक्टूबर 2025 को प्रस्तुत रिपोर्ट में साफ किया गया कि विवाद पूरी तरह से आपसी सहमति से निपट गया है।

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आवेदकों के वकीलों ने दलील दी कि समझौते के बाद मामले को जारी रखने से किसी का भला नहीं होगा। वहीं, शिकायतकर्ता की ओर से भी यह कहा गया कि उन्हें कार्यवाही खत्म किए जाने पर कोई आपत्ति नहीं है।

अदालत की टिप्पणियां

मामले की सुनवाई कर रहे न्यायमूर्ति बृज राज सिंह ने सुप्रीम कोर्ट के कई अहम फैसलों का हवाला दिया। इनमें बी.एस. जोशी, गियन सिंह, और नरिंदर सिंह जैसे निर्णय शामिल थे, जिनमें यह स्पष्ट किया गया है कि कुछ गैर-समझौता योग्य (non-compoundable) अपराधों में भी, यदि विवाद निजी प्रकृति का हो और पक्षकार समझौते पर पहुंच जाएं, तो हाईकोर्ट अपनी अंतर्निहित शक्तियों का इस्तेमाल कर सकता है।

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कोर्ट ने टिप्पणी की,

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“धारा 482 का उद्देश्य न्याय के हितों की रक्षा करना और अदालत की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकना है।”

फैसला

सभी तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में कार्यवाही जारी रखने से कोई उपयोगी उद्देश्य पूरा नहीं होगा। इसलिए कोर्ट ने आवेदन स्वीकार कर लिया और शिकायत केस संख्या 17106/22 से जुड़ी पूरी आपराधिक कार्यवाही को आवेदकों के खिलाफ रद्द कर दिया।

इस तरह, आपसी समझौते के आधार पर लंबे समय से चल रहा यह विवाद यहीं समाप्त हो गया।

Case Title: Raksharam Tiwari and Others vs State of U.P. through Principal Secretary (Home), Lucknow & Another

Case Number: No. 7275 of 2023

Date of Decision: January 5, 2026

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