दिल्ली हाई कोर्ट ने हाल ही में सुरेंद्र बजाज द्वारा दायर उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें उन्होंने एक स्वतंत्र मध्यस्थ नियुक्त करने की मांग की थी। जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौराॅव ने 19 अगस्त 2025 को आदेश सुनाते हुए कहा कि पहले दिए गए न्यायिक आदेशों के मद्देनज़र यह याचिका स्वीकार नहीं की जा सकती।
विवाद की पृष्ठभूमि
यह मामला दिसंबर 2018 के सहयोग समझौते से जुड़ा है, जो बजाज और दिनेश चंद गुप्ता (पश्चिम विहार, नई दिल्ली निवासी) के बीच हुआ था। समझौते के अनुसार, बजाज को निर्माण कार्य करना था और बदले में उन्हें पुनर्निर्मित संपत्ति की दूसरी मंज़िल का स्वामित्व मिलना था। हालांकि, निर्माण पूरा हो जाने के बाद भी बजाज का आरोप है कि गुप्ता परिवार और अन्य प्रतिवादियों ने कब्ज़ा देने से इनकार कर दिया, जिसके चलते उन्होंने मध्यस्थता की धारा का सहारा लिया।
वहीं, प्रतिवादियों का कहना था कि मामला पहले से ही तिस हज़ारी कोर्ट के सिविल जज के समक्ष लंबित है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि बजाज का विवाद को मध्यस्थता में ले जाने का प्रयास पहले ही ट्रायल कोर्ट और अपीलीय अदालत द्वारा खारिज किया जा चुका है। खारिज करने के पीछे तकनीकी खामियां थीं - जैसे मूल सहयोग समझौते की प्रति प्रस्तुत न करना और ऐसे पक्षों का शामिल होना जो समझौते पर हस्ताक्षरकर्ता नहीं थे।
हाई कोर्ट ने कार्यवाही के इतिहास पर गौर किया और माना कि बजाज की धारा 8, मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम 1996 के तहत दायर की गई अर्जी मई 2023 में खारिज हो चुकी है और अप्रैल 2024 में अपील भी खारिज कर दी गई।
इन निष्कर्षों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा:
"पक्षकारों को मध्यस्थ के पास भेजने से विषय-वस्तु विभाजित हो जाएगी, जो अधिनियम की योजना के तहत स्वीकार्य नहीं है।"
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जस्टिस कौराॅव ने आगे कहा कि मौजूदा याचिका उन बाध्यकारी आदेशों को दरकिनार नहीं कर सकती।
"जब तक अपीलीय आदेश कायम है, वही प्रार्थना दोबारा धारा 11 में नहीं दोहराई जा सकती। इसे स्वीकार करना ‘रेस जुडिकाटा’ होगा।"
नतीजतन, याचिका खारिज कर दी गई, हालांकि कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता कानून के अनुसार उपयुक्त मंचों पर उपाय खोज सकते हैं। यह फैसला इस सिद्धांत को मज़बूत करता है कि जहां विवाद में कई पक्ष शामिल हों और सभी समझौते के हस्ताक्षरकर्ता न हों, वहां मध्यस्थता का सहारा नहीं लिया जा सकता।
केस का शीर्षक: सुरेन्द्र बजाज बनाम दिनेश चंद गुप्ता एवं अन्य
केस संख्या: ARB.P. 1076/2025