इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक व्यक्ति के खिलाफ दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 340 के तहत प्रारंभिक न्यायिक जांच का आदेश दिया है। उसकी पत्नी ने आरोप लगाया है कि उसने अग्रिम जमानत आदेश पाने के लिए अदालत के अभिलेखों में जालसाजी और हेराफेरी की।
यह आदेश न्यायमूर्ति शेखर कुमार यादव ने अंकिता प्रियदर्शिनी की अर्जी पर पारित किया। अंकिता ने दावा किया कि उनके पति अर्पण सक्सेना ने न्यायालय के अभिलेखों में हेराफेरी की, अहम तथ्यों को छिपाया और कार्यवाही के दौरान प्रतिरूपण (impersonation) किया।
पत्नी ने अपने पति पर आरोप लगाया कि उसने—
- न्यायिक अभिलेख से काउंटर एफिडेविट (प्रति-शपथपत्र) हटाया।
- उसकी रिकॉल अर्जी में ग़ैर-प्राधिकृत पन्ने जोड़े।
- किसी अन्य व्यक्ति को कई अर्जियों और हलफनामों पर हस्ताक्षर करने की अनुमति दी।
- बिना शपथबद्ध (unsworn) काउंटर एफिडेविट दाखिल किया, जिसे शपथ आयुक्त के सामने सत्यापित नहीं किया गया।
- अदालत को पासपोर्ट स्थिति के बारे में गुमराह किया, यह कहकर कि उसने पासपोर्ट जमा कर दिया जबकि उसने ऐसा नहीं किया।
- उदयपुर जिला अदालत से ग़ैर-कानूनी तरीके से प्राप्त अंतिम रिपोर्ट (Final Report) दाखिल की, जिसकी प्रति पत्नी को नहीं दी गई।
- ‘शॉर्ट काउंटर’ शीर्षक से काउंटर एफिडेविट दाखिल किया ताकि जांच से बचा जा सके।
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पत्नी ने फोटोकॉपी भी पेश कीं जिनमें उनके पति के हस्ताक्षरों में अंतर दिखा—अग्रिम जमानत आवेदन, प्रत्युत्तर हलफनामों और वकालतनामे पर हस्ताक्षर अलग-अलग बताए गए।
मामले की पृष्ठभूमि
- पति-पत्नी वैवाहिक विवाद में उलझे हुए हैं और उनके बीच कई आपराधिक मामले लंबित हैं।
- 17 फरवरी 2021 को पति को अग्रिम जमानत दी गई थी, शर्त यह थी कि वह पासपोर्ट जमा करेगा।
- बाद में, 7 मार्च 2025 को यह शर्त हटा दी गई जब पति ने कहा कि पासपोर्ट की अवधि समाप्त हो गई है और नवीनीकरण की आवश्यकता है।
- पत्नी ने इस आदेश को चुनौती दी, यह कहते हुए कि आदेश बिना उसे सुने पारित किया गया और पति ने पासपोर्ट जमा भी नहीं किया।
- उसकी रिकॉल अर्जी 26 मार्च 2025 को खारिज कर दी गई, जिसमें विवादित काउंटर एफिडेविट पर भरोसा किया गया।
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28 अप्रैल 2025 को सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि जमानत की शर्तों को संशोधित करने के लिए जिस काउंटर एफिडेविट पर भरोसा किया गया, वह शपथ आयुक्त के सामने शपथबद्ध नहीं था।
अदालत ने इसे कहा—
“गंभीर प्रक्रिया संबंधी अनियमितता।”
इसके चलते 7 मार्च और 26 मार्च के आदेश वापस लिए गए और पति को आदेश दिया गया कि वह अपना पासपोर्ट ट्रायल कोर्ट में जमा करे।
अदालत ने यह भी कहा—
“यदि आरोप साबित होते हैं तो यह अदालत को गुमराह करने, न्याय की प्रक्रिया को बाधित करने और न्यायिक कार्यवाही की निष्पक्षता को प्रभावित करने का एक सुनियोजित प्रयास है।”
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अदालत ने धारा 340 CrPC के तहत अपनी शक्तियों का उपयोग करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को एक माह के भीतर प्रारंभिक जांच पूरी करने का निर्देश दिया।
पीठ ने स्पष्ट किया—
“ये कार्यवाही धारा 340 Cr.P.C. के अंतर्गत आती हैं, जो अदालत को जांच का आदेश देने और आवश्यक होने पर सक्षम अदालत में औपचारिक शिकायत दर्ज कराने का अधिकार देती है।”
यह मामला 23 सितंबर 2025 को फिर से सूचीबद्ध किया जाएगा, जब जांच रिपोर्ट के निष्कर्षों की समीक्षा कर आगे आदेश दिए जाएंगे।