केरल हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी व्यक्ति को अश्लील वीडियो बांटने के आरोप में तब तक दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक ट्रायल जज स्वयं वीडियो देखकर यह सुनिश्चित न कर ले कि उसमें अश्लील सामग्री है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दोषसिद्धि से पहले जज को यह देखना जरूरी है कि सामग्री वास्तव में अश्लील है या नहीं।
यह फैसला हरिकुमार बनाम राज्य केरल मामले में आया, जिसमें जस्टिस काउसर एडप्पगथ ने एक ऐसे व्यक्ति की सजा रद्द कर दी, जिस पर अश्लील वीडियो कैसेट किराये पर देने का आरोप था।
जस्टिस एडप्पगथ ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने जब्त किए गए कैसेट को देखे बिना ही आरोपी को दोषी ठहरा दिया था। इस पर उन्होंने कहा:
“जब किसी अभियोजन में अश्लील दृश्य वाले वीडियो कैसेट पेश किए जाते हैं, तो अदालत को स्वयं कैसेट देखकर और परखकर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उसमें वास्तव में अश्लील दृश्य हैं… जब तक कोर्ट/जज स्वयं वीडियो कैसेट नहीं देखता और उसमें अश्लीलता की पुष्टि नहीं करता, तब तक यह नहीं कहा जा सकता कि दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त साक्ष्य हैं।”
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि केवल गवाहों की गवाही या पुलिस की रिपोर्ट के आधार पर अश्लीलता साबित नहीं की जा सकती।
मामला क्या था
- मामला कोट्टायम के हरिकुमार से जुड़ा है, जो एक वीडियो शॉप चलाते थे।
- उन पर दस अश्लील वीडियो कैसेट रखने का आरोप था।
- ट्रायल कोर्ट ने उन्हें भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 292(2)(a), (c), और (d) के तहत दोषी ठहराया, जो अश्लील सामग्री की बिक्री, किराये पर देना और प्रसार से संबंधित है।
- उन्हें दो साल की साधारण कैद और ₹2,000 का जुर्माना लगाया गया।
- अपीलीय अदालत ने सजा घटाकर एक साल कर दी, लेकिन दोषसिद्धि बरकरार रखी।
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हरिकुमार ने इन आदेशों को चुनौती दी और कहा कि मजिस्ट्रेट ने कभी वीडियो कैसेट देखे ही नहीं, बल्कि केवल अधिकारियों की रिपोर्ट और गवाहों की गवाही पर भरोसा किया।
हाईकोर्ट ने कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 के अनुसार, वीडियो कैसेट प्राथमिक साक्ष्य होते हैं। इसलिए, अदालत को इन्हें सीधे जांचना जरूरी है।
“कोर्ट द्वारा वीडियो कैसेट की प्रत्यक्ष जांच आवश्यक थी… जब तक कोर्ट अभियोजन द्वारा प्रस्तुत वीडियो कैसेट को स्वयं नहीं देखता, तब तक यह नहीं कहा जा सकता कि उसमें अश्लील सामग्री है।”
कोर्ट ने माना कि पुलिस अधिकारियों और गवाहों की गवाही सहायक हो सकती है, लेकिन कानून के मुताबिक साक्ष्य की जांच का स्थानापन्न नहीं हो सकती।
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चूंकि न ट्रायल कोर्ट और न ही अपीलीय अदालत ने वीडियो कैसेट को सीधे देखा, इसलिए हाईकोर्ट ने माना कि दोषसिद्धि टिक नहीं सकती।
केस का नाम: Harikumar v. State of Kerala