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गुजरात उच्च न्यायालय ने वैवाहिक विवाद में पति को राहत देने से इनकार कर पत्नी को 50,000 रुपये मासिक भरण-पोषण देने के आदेश को बरकरार रखा।

Shivam
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गुजरात हाईकोर्ट ने पति की याचिका खारिज कर पत्नी को ₹50,000 मासिक भरण-पोषण देने का आदेश बरकरार रखा, बीमारी और जीवन स्तर को अहम माना। - वसंतभाई प्रेमजीभाई वेकारिया बनाम गुजरात राज्य एवं अन्य।

गुजरात उच्च न्यायालय ने वैवाहिक विवाद में पति को राहत देने से इनकार कर पत्नी को 50,000 रुपये मासिक भरण-पोषण देने के आदेश को बरकरार रखा।

अहमदाबाद स्थित गुजरात हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में पति द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज करते हुए पत्नी को दिए गए ₹50,000 मासिक भरण-पोषण (maintenance) के आदेश को बरकरार रखा। अदालत ने स्पष्ट किया कि पति अपनी जिम्मेदारी से केवल आय कम दिखाकर बच नहीं सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला पति द्वारा चुनौती दी गई उस फैमिली कोर्ट के आदेश से जुड़ा था, जिसमें पत्नी को ₹50,000 प्रति माह भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था। पत्नी ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत आवेदन दायर कर कहा था कि उसे नियमित आर्थिक सहायता नहीं मिल रही है और वैवाहिक संबंध भी लंबे समय से खराब हैं।

रिकॉर्ड के अनुसार, दोनों की शादी 1995 में हुई थी और एक पुत्र भी है। पत्नी ने मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न के आरोप लगाए और बताया कि उसे अपने खर्चों के लिए पर्याप्त सहायता नहीं दी जा रही थी।

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पति की ओर से दलील दी गई कि फैमिली कोर्ट ने साक्ष्यों का सही मूल्यांकन नहीं किया और उसकी वास्तविक आय को नजरअंदाज किया। यह भी कहा गया कि पत्नी पहले उसके साथ रह रही थी और उसके खर्च वह उठा रहा था, इसलिए आवेदन ही टिकाऊ नहीं था।

उन्होंने यह भी तर्क दिया कि कोविड के बाद व्यवसाय में गिरावट आई और ₹50,000 प्रति माह देना उसकी क्षमता से बाहर है।

पत्नी की ओर से कहा गया कि पति ने अपनी वास्तविक आय छिपाई है और वह एक सफल व्यवसायी है, जिसकी आय लाखों में है। यह भी बताया गया कि पत्नी कैंसर से पीड़ित है और इलाज के लिए नियमित खर्च की जरूरत है।

वकील ने अदालत से कहा,

“पति जानबूझकर अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश कर रहा है और आय कम दिखा रहा है।”

न्यायमूर्ति हसमुख डी. सुथार ने सुनवाई के दौरान कहा कि केवल आय कम दिखाना या व्यवसाय में गिरावट का दावा करना, पति को भरण-पोषण की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करता।

अदालत ने कहा,

“सिर्फ यह कहना कि आय कम है, पर्याप्त नहीं है। सक्षम (able-bodied) पति पर पत्नी का भरण-पोषण करना कानूनी और नैतिक दायित्व है।”

कोर्ट ने यह भी माना कि पत्नी की बीमारी (कैंसर) और जीवन स्तर को देखते हुए तय राशि उचित है।

अदालत ने पाया कि फैमिली कोर्ट का आदेश साक्ष्यों पर आधारित है और उसमें कोई कानूनी त्रुटि नहीं है।

अंततः, हाईकोर्ट ने पति की पुनरीक्षण याचिका खारिज करते हुए ₹50,000 प्रति माह भरण-पोषण के आदेश को बरकरार रखा और कहा कि इसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।

Case Details

Case Title: Vasantbhai Premjibhai Vekariya vs State of Gujarat & Anr.

Case Number: Criminal Revision Application No. 175 of 2022

Judge: Justice Hasmukh D. Suthar

Decision Date: April 24, 2026

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