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पुराने आपराधिक मामले के बावजूद नौकरी का हक: गुजरात HC ने भर्ती रोके जाने का आदेश किया रद्द

Shivam
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भरतभाई खुमसिंहभाई सांगोद बनाम गुजरात राज्य और अन्य - गुजरात उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि एक नाबालिग, जिसकी एफआईआर पहले ही रद्द हो चुकी है, पुलिस भर्ती से इनकार नहीं कर सकता, और चयनित निहत्थे कांस्टेबल उम्मीदवार की अस्वीकृति को रद्द कर दिया।

पुराने आपराधिक मामले के बावजूद नौकरी का हक: गुजरात HC ने भर्ती रोके जाने का आदेश किया रद्द

अहमदाबाद में गुरुवार को गुजरात हाईकोर्ट ने एक ऐसे युवक के पक्ष में फैसला सुनाया, जिसे पुलिस भर्ती में चयन के बाद भी नौकरी से रोक दिया गया था। वजह थी एक पुराना आपराधिक मामला, जो बाद में अदालत से रद्द हो चुका था। अदालत ने साफ कहा कि सिर्फ ऐसे मामूली और पहले ही खत्म हो चुके मामले के आधार पर किसी योग्य उम्मीदवार को नौकरी से वंचित नहीं किया जा सकता। “अगर FIR और उससे जुड़ी कार्यवाही पहले ही खत्म हो चुकी है, तो उसका साया हमेशा किसी के पीछे नहीं चल सकता,” कोर्ट ने टिप्पणी की।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता भरतभाई खुमसिंहभाई संगोड़ ने 2021 में लोक रक्षक भर्ती बोर्ड की ओर से निकली विज्ञप्ति के तहत अनआर्म्ड पुलिस कॉन्स्टेबल (लोकरक्षक) और SRPF कॉन्स्टेबल के पद के लिए आवेदन किया था। चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद उनका नाम चयन सूची में आ गया।

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लेकिन अक्टूबर 2023 में राज्य सरकार की ओर से उन्हें एक आदेश मिला, जिसमें कहा गया कि 2018 में दर्ज एक आपराधिक मामले के कारण उन्हें नौकरी पर नहीं लिया जाएगा। यह मामला बाद में हाईकोर्ट की एक सहमति से हुई कार्यवाही में पहले ही रद्द हो चुका था। इसके बावजूद पुलिस विभाग ने डीजीपी कार्यालय से मार्गदर्शन लेकर उनकी नियुक्ति रोक दी।

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याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत को बताया कि ऑनलाइन आवेदन फॉर्म में किसी भी आपराधिक मामले का अलग से कॉलम ही नहीं था, इसलिए छिपाने या गलत जानकारी देने का सवाल नहीं उठता। उन्होंने कहा कि जिस मामले का हवाला देकर नियुक्ति रोकी गई, उसमें सिर्फ “लात-घूंसे मारने और गाली देने” जैसे आरोप थे और वह भी बाद में आपसी सहमति से खत्म हो चुका था।

वकील ने दलील दी,

“ऐसे छोटे और पहले ही रद्द हो चुके मामले के आधार पर किसी की पूरी मेहनत पर पानी फेर देना सही नहीं है।” उन्होंने यह भी कहा कि अगर ऐसा चलन बन गया तो किसी भी योग्य उम्मीदवार के खिलाफ झूठी शिकायत दर्ज कराकर उसका भविष्य खराब किया जा सकता है।

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राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि पुलिस बल एक अनुशासित और संवेदनशील सेवा है, जहां चरित्र और आचरण की जांच बहुत जरूरी होती है। सरकार ने दलील दी कि चयन के बाद भी चरित्र सत्यापन होता है और उसी दौरान पुराने मामले की जानकारी सामने आई। इसी आधार पर, “साफ रिकॉर्ड” बनाए रखने के उद्देश्य से नियुक्ति रोकी गई।

जस्टिस निरज़र एस. देसाई की पीठ ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद कहा कि हर मामला एक जैसा नहीं होता। अदालत ने कहा,

“सिर्फ FIR दर्ज होना या पहले कोई मामला होना अपने आप में नौकरी से बाहर करने का आधार नहीं बन सकता।”

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कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि इस केस में आरोप बहुत हल्के थे और बाद में वह मामला पूरी तरह से खत्म हो चुका था।

“ऐसे में यह देखना जरूरी है कि आरोप कितने गंभीर थे, उम्मीदवार की भूमिका क्या थी और क्या उससे उसकी ईमानदारी या चरित्र पर कोई बड़ा सवाल खड़ा होता है,” बेंच ने कहा।

हाईकोर्ट ने 12 अक्टूबर 2023 का वह आदेश रद्द कर दिया, जिसके जरिए याचिकाकर्ता की नियुक्ति रोकी गई थी। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता के मामले पर नए सिरे से, कोर्ट की टिप्पणियों को ध्यान में रखते हुए, विचार करे।

साथ ही कहा गया कि अगर वह बाकी सभी शर्तें और मेडिकल जांच पूरी करता है, तो उसे अनआर्म्ड कॉन्स्टेबल (लोकरक्षक) के पद पर नियुक्त किया जाए।

Case Title:- Bharatbhai Khumsinghbhai Sangod vs State of Gujarat & Ors.

Case Number:- Special Civil Application No. 21060 of 2023

Date of Judgment:- 29 January 2026

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