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दशकों बाद किया सेवा दावा खारिज: हिमाचल हाई कोर्ट ने ट्रिब्यूनल का आदेश पलटा

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हिमाचल हाई कोर्ट ने ट्रिब्यूनल का आदेश रद्द कर दिया और कहा कि दशकों बाद दायर सेवा दावा लिमिटेशन के कारण स्वीकार नहीं किया जा सकता। - हिमाचल प्रदेश राज्य और अन्य बनाम गीता देवी

दशकों बाद किया सेवा दावा खारिज: हिमाचल हाई कोर्ट ने ट्रिब्यूनल का आदेश पलटा

हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में राज्य प्रशासनिक ट्रिब्यूनल के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें एक कर्मचारी को सेवा से जुड़े लाभ देने के निर्देश दिए गए थे। कोर्ट ने साफ कहा कि तय समय सीमा (लिमिटेशन) के बाद दायर किए गए दावों को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला राज्य सरकार द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है, जिसमें 2019 के ट्रिब्यूनल आदेश को चुनौती दी गई थी। ट्रिब्यूनल ने गीता देवी के पक्ष में फैसला देते हुए 1996 और 1998 के बीच के मातृत्व अवकाश और बीमारी के समय को निरंतर सेवा (continuous service) माना था।

इसके आधार पर ट्रिब्यूनल ने उन्हें 10 साल की सेवा पूरी होने पर वर्क-चार्ज स्टेटस देने और अन्य लाभों पर विचार करने का निर्देश दिया था, हालांकि वित्तीय लाभ केवल तीन साल पहले तक सीमित रखे गए थे।

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राज्य सरकार ने दलील दी कि ट्रिब्यूनल ने बिना जवाब दाखिल करने का मौका दिए ही मामला निपटा दिया, जिससे उनके बचाव का अधिकार प्रभावित हुआ।

मुख्य न्यायाधीश जी.एस. संधावालिया की अगुवाई वाली बेंच ने ट्रिब्यूनल की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि राज्य को जवाब दाखिल करने का अधिकार देना जरूरी था।

बेंच ने कहा, “राज्य को अपना जवाब देने का अधिकार इस तरह सीमित नहीं किया जा सकता, जैसा ट्रिब्यूनल ने किया।”

कोर्ट ने प्रशासनिक ट्रिब्यूनल अधिनियम, 1985 के तहत लिमिटेशन के प्रावधानों का भी हवाला दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सेवा से जुड़े विवाद आमतौर पर एक वर्ष के भीतर उठाए जाने चाहिए।

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इस मामले में कर्मचारी ने 1996 और 1998 के घटनाक्रम को लेकर 2019 में आवेदन किया, जिसे कोर्ट ने स्पष्ट रूप से समयसीमा से बाहर माना।

हाई कोर्ट ने कहा कि बार-बार दिए गए आवेदन या देरी से किए गए प्रतिनिधित्व (representation) लिमिटेशन को बढ़ा नहीं सकते।

कोर्ट ने यह भी कहा कि ट्रिब्यूनल की स्थापना का उद्देश्य सेवा विवादों का तेजी से निपटारा करना है, और पुराने मामलों को स्वीकार करना इस उद्देश्य के विपरीत है।

बेंच ने यह भी नोट किया कि कर्मचारी को 2017 में नियमित (regularize) किया जा चुका था, लेकिन उस समय कोई आपत्ति नहीं उठाई गई। बाद में पुराने समय से लाभ मांगना उचित नहीं पाया गया।

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हाई कोर्ट ने माना कि मूल आवेदन समयसीमा से बाहर था और इसमें देरी का कोई ठोस कारण नहीं बताया गया।

कोर्ट ने कहा,

“मूल आवेदन स्पष्ट रूप से लिमिटेशन से बाधित था,” और ट्रिब्यूनल के 9 अप्रैल 2019 के आदेश को रद्द कर दिया।

इसके साथ ही राज्य की याचिका स्वीकार करते हुए कर्मचारी का दावा पूरी तरह खारिज कर दिया गया।

Case Title: The State of HP & Ors. vs Geeta Devi

Case Number: CWP No. 4073 of 2019

Judges: Chief Justice G.S. Sandhawalia & Justice Bipin Chander Negi

Decision Date: 11 March 2026

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