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कभी साथ न रहने वाले दंपति को राहत: दिल्ली हाईकोर्ट ने एक साल की शर्त से पहले तलाक की इजाज़त दी

Shivam Y.

X&Y - दिल्ली उच्च न्यायालय ने आपसी सहमति से शीघ्र तलाक की अनुमति दी, यह मानते हुए कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत अस्तित्वहीन विवाह के लिए एक वर्ष तक प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है।

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कभी साथ न रहने वाले दंपति को राहत: दिल्ली हाईकोर्ट ने एक साल की शर्त से पहले तलाक की इजाज़त दी
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दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम पारिवारिक विवाद में साफ कहा कि अगर शादी सिर्फ कागज़ों तक सीमित रह जाए और दंपति कभी साथ न रहे हों, तो उन्हें बेवजह एक साल इंतज़ार करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें एक साल की अवधि से पहले आपसी सहमति से तलाक की अनुमति देने से इनकार किया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला एक ऐसी शादी से जुड़ा है जो मार्च 2025 में हुई थी। शादी आर्य समाज मंदिर में संपन्न हुई और कुछ ही दिनों बाद इसका पंजीकरण भी कराया गया। लेकिन यह बात निर्विवाद रही कि शादी के बाद पति-पत्नी कभी साथ नहीं रहे। न तो सहवास हुआ और न ही उन्होंने एक दिन भी एक-दूसरे के साथ बिताया।

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कुछ ही समय में दोनों को यह एहसास हो गया कि वे एक-दूसरे के साथ वैवाहिक जीवन नहीं बिता सकते। इसके बाद उन्होंने आपसी सहमति से तलाक लेने का फैसला किया। चूंकि शादी को एक साल पूरा नहीं हुआ था, इसलिए उन्होंने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 14 के तहत अदालत से पहले तलाक याचिका दाखिल करने की अनुमति मांगी।

फैमिली कोर्ट ने यह कहते हुए अनुमति देने से इनकार कर दिया कि “असाधारण कठिनाई” साबित नहीं हुई है और शादी को बचाने के पर्याप्त प्रयास नहीं किए गए।

हाईकोर्ट की टिप्पणियां

अपील पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने मामले के तथ्यों को गंभीरता से देखा। अदालत ने माना कि दोनों पक्ष शादी के बाद से अलग-अलग रह रहे हैं, उनका विवाह कभी वास्तविक रूप से शुरू ही नहीं हुआ और कोई संतान भी नहीं है।

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पीठ ने टिप्पणी की,

“जब विवाह कभी अस्तित्व में ही नहीं आया, तो उसे बचाने की अपेक्षा करना व्यावहारिक नहीं है।”

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल शादी का पंजीकरण यह साबित नहीं करता कि दंपति के बीच वैवाहिक जीवन सफल रहा या साथ रहने की कोई संभावना थी।

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हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में एक अहम पहलू यह है कि पति-पत्नी अलग-अलग देशों में रह रहे हैं। एक पक्ष भारत में अपने बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल के कारण विदेश नहीं जा सकता, जबकि दूसरा पक्ष भारत में बसने की स्थिति में नहीं है।

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अदालत ने माना कि ऐसी परिस्थिति में एक साल की वैधानिक अवधि का इंतज़ार कराना सिर्फ कानूनी औपचारिकता होगी। पीठ ने कहा,

“कानून का उद्देश्य व्यर्थ पीड़ा बढ़ाना नहीं, बल्कि वास्तविक जीवन की परिस्थितियों को ध्यान में रखना है।”

अदालत का अंतिम फैसला

इन सभी तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द कर दिया। अदालत ने धारा 14 के तहत अनुमति देते हुए कहा कि यह मामला ‘असाधारण कठिनाई’ की श्रेणी में आता है।

हाईकोर्ट ने दंपति को एक साल की अवधि पूरी होने से पहले ही आपसी सहमति से तलाक की याचिका दाखिल करने की छूट दे दी और मामले को आगे की कार्रवाई के लिए फैमिली कोर्ट को वापस भेज दिया।

Case Title:- X & Y

Case Number: MAT.APP.(F.C.) 443/2025

Date of Decision: 20 January 2026

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