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पति से अधिक कमाने वाली पत्नी को बिना आर्थिक आवश्यकता साबित किए अंतरिम भरण-पोषण नहीं मिल सकता: कर्नाटक हाईकोर्ट

Shivam
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कर्नाटक हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का अंतरिम भरण-पोषण आदेश रद्द करते हुए कहा कि यदि पत्नी आर्थिक रूप से सक्षम है और उसकी आय पति से अधिक है, तो बिना आर्थिक आवश्यकता साबित किए उसे अंतरिम भरण-पोषण नहीं दिया जा सकता।

पति से अधिक कमाने वाली पत्नी को बिना आर्थिक आवश्यकता साबित किए अंतरिम भरण-पोषण नहीं मिल सकता: कर्नाटक हाईकोर्ट

कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि घरेलू हिंसा कानून के तहत याचिका दायर करने मात्र से पत्नी को अंतरिम भरण-पोषण (Interim Maintenance) देने का आदेश नहीं दिया जा सकता। यदि पत्नी आर्थिक रूप से सक्षम है, उसकी आय पति से अधिक है और वह स्वयं अपना खर्च उठाने में सक्षम है, तो अदालत को सभी तथ्यों का मूल्यांकन करने के बाद ही भरण-पोषण पर निर्णय लेना चाहिए।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला उस याचिका से जुड़ा है जिसमें पत्नी ने घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत सुरक्षा, आवास, मुआवजा, मुकदमे का खर्च और ₹1,13,515 प्रति माह भरण-पोषण की मांग की थी।

मामले की सुनवाई के दौरान मैसूर की न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत ने पति को पत्नी को ₹20,000 प्रति माह अंतरिम भरण-पोषण देने का आदेश दिया। इस आदेश को पति ने कर्नाटक हाईकोर्ट में चुनौती दी।

पति का कहना था कि उसकी मासिक आय लगभग ₹57,000 से ₹60,000 है, जबकि पत्नी एक निजी कंपनी में कार्यरत है और उसकी मासिक आय ₹1 लाख से अधिक है। ऐसे में उससे भरण-पोषण दिलाने का आदेश कानून के अनुरूप नहीं है।

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वहीं पत्नी की ओर से दलील दी गई कि उसने विवाह के लिए ऋण लिया था और उसी का भुगतान कर रही है, इसलिए उसे आर्थिक सहायता की आवश्यकता है।

न्यायमूर्ति डॉ. चिल्लाकुर सुमलथा ने दोनों पक्षों द्वारा दाखिल आय और संपत्ति के शपथपत्रों तथा वेतन संबंधी दस्तावेजों का परीक्षण किया।

अदालत ने पाया कि पति ने अपनी आय का पूरा विवरण दिया है और पत्नी ने भी अपने शपथपत्र में स्वीकार किया है कि उसकी मासिक आय लगभग ₹1 लाख है। रिकॉर्ड में मौजूद टीडीएस विवरण से यह भी सामने आया कि कुछ महीनों में उसकी मासिक आय लगभग ₹1.64 लाख थी।

अदालत ने यह भी कहा कि पत्नी ने विवाह ऋण या उसकी मासिक किस्तों (EMI) के संबंध में कोई ठोस दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया।

पीठ ने कहा, "सिर्फ इसलिए कि कोई महिला, विशेष रूप से पत्नी, भरण-पोषण का दावा करते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाती है, अदालतें बिना सभी तथ्यों पर विचार किए पति को भुगतान का आदेश नहीं दे सकतीं।"

अदालत ने आगे कहा कि यदि पत्नी आर्थिक रूप से सक्षम है, उसकी आय पति से अधिक है और उसके ऊपर बच्चों के पालन-पोषण जैसी अतिरिक्त जिम्मेदारी भी नहीं है, तो केवल वैवाहिक संबंध के आधार पर अंतरिम भरण-पोषण नहीं दिया जा सकता।

पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि भरण-पोषण तभी दिया जाना चाहिए जब यह साबित हो कि पत्नी अपनी आय से स्वयं का उचित निर्वाह करने में सक्षम नहीं है।

हाईकोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने पत्नी की आय पर पर्याप्त विचार किए बिना अंतरिम भरण-पोषण का आदेश पारित कर दिया था। इसलिए यह आदेश कानून की दृष्टि में टिक नहीं सकता।

इसी आधार पर अदालत ने पति की रिट याचिका स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट का ₹20,000 प्रति माह अंतरिम भरण-पोषण देने वाला आदेश रद्द कर दिया।

हालांकि, हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस आदेश में की गई टिप्पणियां केवल अंतरिम आदेश की वैधता तक सीमित हैं। इनका प्रभाव घरेलू हिंसा मामले के अंतिम निर्णय या भविष्य में परिस्थितियों में बदलाव होने पर दायर किसी नई अंतरिम भरण-पोषण याचिका पर नहीं पड़ेगा।

Case Details

Case Title: X and Y

Case Number: W.P. No. 2327 of 2026 (GM-FC)

Judge: Hon'ble Dr. Justice Chillakur Sumalatha

Decision Date: 18 June 2026

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