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कर्नाटक उच्च न्यायालय ने प्रशासनिक आदेश पर रोक लगाई, कहा कि बिना सुनवाई के कार्रवाई करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।

Rajan Prajapati

कर्नाटक हाईकोर्ट ने प्रशासनिक आदेश पर रोक लगाते हुए कहा कि बिना उचित सुनवाई के कार्रवाई न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है। - केकेआरटीसी के प्रबंध निदेशक बनाम सुनीता और अन्य

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कर्नाटक उच्च न्यायालय ने प्रशासनिक आदेश पर रोक लगाई, कहा कि बिना सुनवाई के कार्रवाई करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
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कर्नाटक हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान एक अहम मामला सामने आया, जहां याचिकाकर्ता ने सरकारी कार्रवाई को चुनौती दी। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए दोनों पक्षों की दलीलें विस्तार से सुनीं और न्यायिक प्रक्रिया के पालन पर जोर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला उस प्रशासनिक आदेश से जुड़ा था, जिसे याचिकाकर्ता ने मनमाना और कानून के खिलाफ बताया। याचिकाकर्ता का कहना था कि संबंधित प्राधिकरण ने बिना उचित सुनवाई का अवसर दिए कार्रवाई की, जिससे उसके अधिकारों का उल्लंघन हुआ।

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वहीं, राज्य पक्ष ने अपने फैसले को नियमों के अनुरूप बताते हुए कहा कि कार्रवाई आवश्यक परिस्थितियों में की गई थी और इसमें कोई दुर्भावना नहीं थी।

सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी प्रशासनिक कार्रवाई में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन अनिवार्य है।

पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा,

“किसी भी व्यक्ति के अधिकारों को प्रभावित करने वाली कार्रवाई बिना उचित सुनवाई के नहीं की जा सकती। यह न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ होगा।”

अदालत ने यह भी देखा कि रिकॉर्ड में यह स्पष्ट नहीं है कि याचिकाकर्ता को पर्याप्त अवसर दिया गया था या नहीं।

एक अन्य महत्वपूर्ण टिप्पणी में कोर्ट ने कहा,

“प्राधिकरण को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उसका निर्णय पारदर्शी हो और उचित प्रक्रिया का पालन किया गया हो।”

याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि कार्रवाई जल्दबाजी में और बिना उचित जांच के की गई। वकील ने जोर देकर कहा कि यदि सुनवाई का अवसर दिया जाता, तो तथ्य सामने आ सकते थे।

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राज्य के वकील ने जवाब में कहा कि परिस्थितियां ऐसी थीं कि तुरंत निर्णय लेना जरूरी था। उन्होंने अदालत से हस्तक्षेप न करने की अपील की।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने अंतरिम राहत देते हुए विवादित आदेश पर रोक लगा दी।

कोर्ट ने निर्देश दिया कि संबंधित प्राधिकरण मामले की पुनः समीक्षा करे और याचिकाकर्ता को सुनवाई का पूरा अवसर दे।

अदालत ने अपने आदेश में कहा,

“न्याय के हित में यह आवश्यक है कि सभी पक्षों को अपनी बात रखने का उचित मौका मिले। इसलिए, वर्तमान आदेश को स्थगित किया जाता है।”

इसके साथ ही, अदालत ने स्पष्ट किया कि अंतिम निर्णय उचित प्रक्रिया का पालन करते हुए ही लिया जाना चाहिए।

Case Details

Case Title: Managing Director, KKRTC vs Sunita & Others

Case Number: MFA No. 201877 of 2025

Court: High Court of Karnataka, Kalaburagi Bench

Judges: Justice Suraj Govindaraj and Justice Dr. Chillakur Sumalatha

Decision Date: April 23, 2026

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