Logo

बलात्कार और POCSO मामलों में 60 दिन की चार्जशीट समयसीमा आरोपी के लिए डिफॉल्ट बेल का शॉर्टकट नहीं: कर्नाटक हाई कोर्ट

Shivam
Add Court Book as a preferred source on Google

कर्नाटक हाई कोर्ट ने कहा कि गंभीर मामलों में 90 दिन की समयसीमा लागू होगी और 60 दिन में चार्जशीट न होने से डिफॉल्ट बेल का अधिकार नहीं मिलता। - गोविंदा बनाम कर्नाटक राज्य एवं अन्य

बलात्कार और POCSO मामलों में 60 दिन की चार्जशीट समयसीमा आरोपी के लिए डिफॉल्ट बेल का शॉर्टकट नहीं: कर्नाटक हाई कोर्ट

कर्नाटक हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि केवल 60 दिनों के भीतर जांच पूरी न होने के आधार पर आरोपी को स्वतः जमानत (डिफॉल्ट बेल) का अधिकार नहीं मिलता, खासकर जब अपराध गंभीर श्रेणी का हो।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला गोविंदा बनाम राज्य कर्नाटक से जुड़ा है, जिसमें आरोपी पर POCSO Act, SC/ST Act और भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत गंभीर आरोप लगे थे।

रिकॉर्ड के अनुसार, मृतका और आरोपी एक-दूसरे को जानते थे और संबंध में थे। आरोप है कि मृतका नाबालिग थी और उसकी मृत्यु के समय वह गर्भवती पाई गई। इसके बाद पुलिस ने मामला दर्ज कर आरोपी को 14 अक्टूबर 2025 को गिरफ्तार किया।

Read also:- मजदूरों के बकाया भुगतान पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, कंपनियों की संपत्तियों के उपयोग पर दिया अहम आदेश

Court Book subscription: bare acts, legal drafts, court judgments and ad-free legal news, plans from ₹30/month

आरोपी ने यह कहते हुए डिफॉल्ट बेल मांगी कि 60 दिनों के भीतर चार्जशीट दाखिल नहीं हुई।

न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना की एकल पीठ ने मामले की विस्तृत सुनवाई के बाद महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्नों पर विचार किया।

अदालत ने कहा कि:

“कानून में 60 दिन और 90 दिन की समयसीमा अलग-अलग प्रकार के अपराधों के लिए निर्धारित है। गंभीर अपराधों में 90 दिन की अवधि लागू होती है।”

अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपी पर लगे आरोप ऐसे हैं जिनमें सजा 10 साल या उससे अधिक हो सकती है, इसलिए जांच पूरी करने के लिए 90 दिन का समय वैध है।

Read also:- सबरीमाला मामला: सुधार के नाम पर धर्म को कमजोर नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

चार्जशीट 84वें दिन दाखिल की गई थी, जो निर्धारित समयसीमा के भीतर है।

अदालत ने कहा कि BNSS की धारा 193(2) में 60 दिनों में जांच पूरी करने की बात कही गई है, लेकिन इसका उद्देश्य पीड़ित को त्वरित न्याय देना है, न कि आरोपी को जमानत का अधिकार देना।

“यह प्रावधान पीड़ित के हित में है, इसे आरोपी के लिए राहत का आधार नहीं बनाया जा सकता,” अदालत ने कहा।

आरोपी ने यह भी तर्क दिया कि चार्जशीट अधूरी थी क्योंकि उसमें FSL, DNA और कॉल रिकॉर्ड जैसी रिपोर्ट शामिल नहीं थीं।

Read also:- LLb छात्रा पर फर्जी वकालत कर ठगी का आरोप, गुजरात हाई कोर्ट ने अग्रिम जमानत याचिका ठुकराई

इस पर अदालत ने साफ कहा:

“सिर्फ इस आधार पर कि कुछ दस्तावेज बाद में पेश किए जाएंगे, चार्जशीट को अधूरा नहीं माना जा सकता और इससे डिफॉल्ट बेल का अधिकार उत्पन्न नहीं होता।”

अदालत ने दोनों आधारों-60 दिन की देरी और कथित अधूरी चार्जशीट-को अस्वीकार करते हुए याचिका खारिज कर दी।

न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि आरोपी को डिफॉल्ट बेल का कोई अधिकार नहीं बनता क्योंकि चार्जशीट 90 दिनों के भीतर दाखिल की गई थी और कानून का उल्लंघन नहीं हुआ।

Case Details

Case Title: Govinda vs State of Karnataka & Anr.

Case Number: Writ Petition No. 5248 of 2026

Judge: Justice M. Nagaprasanna

Decision Date: 10 April 2026

Download Order

Take CourtBook Everywhere

Access your account on the go with our mobile app.

Get it on Google PlayDownload on the App Store
Join the Court Book WhatsApp channel for latest judgments, notifications, legal news and exam updates