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सुप्रीम कोर्ट ने महिला वकीलों के लिए खराब सुविधाओं पर चिंता जताई और युवा वकीलों के लिए वित्तीय सहायता कोष का समर्थन किया।

Zaved Khan
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सुप्रीम कोर्ट ने महिला वकीलों के लिए बुनियादी सुविधाओं की कमी पर चिंता जताते हुए युवा अधिवक्ताओं को आर्थिक सहायता देने हेतु विशेष कोष बनाने का सुझाव दिया। - सरिता त्यागी एवं अन्य बनाम भारत संघ एवं अन्य

सुप्रीम कोर्ट ने महिला वकीलों के लिए खराब सुविधाओं पर चिंता जताई और युवा वकीलों के लिए वित्तीय सहायता कोष का समर्थन किया।

सुप्रीम कोर्ट ने देशभर की अदालतों में महिला वकीलों के लिए पर्याप्त सुविधाओं की कमी पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। साथ ही अदालत ने युवा अधिवक्ताओं को उनके शुरुआती पेशेवर वर्षों में आर्थिक सहायता देने के लिए एक विशेष कोष बनाए जाने के विचार का भी समर्थन किया है।

महिला अधिवक्ताओं द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा कि कानूनी पेशे में केवल प्रवेश का अवसर पर्याप्त नहीं है, बल्कि ऐसे हालात भी होने चाहिए जो वकीलों को सम्मानजनक और सुरक्षित वातावरण में काम करने की सुविधा दें।

याचिकाकर्ताओं ने अदालत का ध्यान इस ओर दिलाया कि देश के अनेक उच्च न्यायालयों, जिला न्यायालयों, तहसील न्यायालयों, अधिकरणों और आयोगों में महिलाओं के लिए समुचित बार रूम और अन्य बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं।

याचिका के साथ प्रस्तुत सर्वेक्षण में बताया गया कि कई न्यायालय परिसरों में या तो महिलाओं के लिए अलग बार रूम नहीं हैं या उपलब्ध सुविधाएं बेहद अपर्याप्त हैं। रिपोर्ट में स्वच्छ शौचालय, बैठने की व्यवस्था, कपड़े बदलने के स्थान और नर्सिंग सुविधाओं जैसी मूलभूत आवश्यकताओं की कमी का उल्लेख किया गया।

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याचिकाकर्ताओं ने युवा वकीलों के सामने आने वाली आर्थिक चुनौतियों का भी मुद्दा उठाया और नए अधिवक्ताओं को मासिक सहायता प्रदान करने के लिए एक विशेष कोष बनाए जाने का सुझाव दिया।

पीठ ने कहा कि इस मुद्दे को केवल सुविधा का प्रश्न मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि न्यायालय परिसर केवल मुकदमों की सुनवाई का स्थान नहीं हैं, बल्कि वकीलों का कार्यस्थल भी हैं, जहां वे अपने पेशेवर जीवन का बड़ा हिस्सा बिताते हैं।

कोर्ट ने कहा, “महिला पेशेवरों के लिए न्यायालय परिसरों में पर्याप्त और उपयुक्त स्थान उपलब्ध कराना एक अनिवार्य आवश्यकता है।”

पीठ ने आगे कहा कि महिलाओं के लिए आवश्यक सुविधाओं की उपलब्धता संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गरिमापूर्ण जीवन और कार्य करने के अधिकार से सीधे जुड़ी हुई है।

कोर्ट ने कहा, “जब महिला अधिवक्ताओं को दिन का बड़ा हिस्सा न्यायालय परिसर में बिताना पड़ता है, तब उनकी सुविधा, गोपनीयता, सुरक्षा और पेशेवर कार्यों के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे का महत्व अत्यंत बढ़ जाता है।”

अदालत ने माना कि कानूनी पेशे में प्रवेश करने वाले युवा, विशेषकर प्रथम पीढ़ी के वकील, शुरुआती वर्षों में गंभीर आर्थिक कठिनाइयों का सामना करते हैं।

पीठ ने कहा कि एक नया वकील अपने साथ न तो स्थापित कार्यालय लाता है, न स्थायी मुवक्किल और न ही निश्चित आय का स्रोत। शुरुआती वर्षों में अधिकांश समय वरिष्ठ अधिवक्ताओं की सहायता करते हुए और न्यायालयी कार्यप्रणाली सीखते हुए बीतता है।

कोर्ट ने टिप्पणी की, “नियमित आय के अभाव और सीमित पारिश्रमिक के कारण युवा अधिवक्ताओं को गंभीर आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।”

अदालत ने चेतावनी दी कि ऐसी परिस्थितियां कई प्रतिभाशाली वकीलों को मुकदमेबाजी का पेशा छोड़ने के लिए मजबूर कर सकती हैं, जिससे विधिक पेशे में प्रतिभा का नुकसान हो सकता है।

इन चुनौतियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने “यंग लॉयर्स प्रोफेशनल असिस्टेंस फंड” स्थापित करने का सुझाव दिया। अदालत के अनुसार, यह कोष संबंधित उच्च न्यायालयों या केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा गठित किसी स्वायत्त निकाय के नियंत्रण में संचालित किया जा सकता है।

कोर्ट ने सुझाव दिया कि इस कोष में वरिष्ठ वकीलों के योगदान, न्यायालय शुल्क के एक हिस्से और न्यायिक कार्यवाहियों में लगाए गए खर्चों की राशि का उपयोग किया जा सकता है। दान को प्रोत्साहित करने के लिए कर छूट और राष्ट्रीय सम्मान जैसे प्रोत्साहनों पर भी विचार किया जा सकता है।

अदालत ने कहा कि इस कोष से प्रथम पीढ़ी के वकीलों और आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि से आने वाले अधिवक्ताओं को शुरुआती वर्षों में मासिक सहायता दी जा सकती है। यह सहायता शुरुआती तीन वर्षों तक पर्याप्त होनी चाहिए और बाद में धीरे-धीरे कम की जा सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसकी ये टिप्पणियां फिलहाल प्रारंभिक और सुझावात्मक प्रकृति की हैं। अदालत ने मामले में सभी प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया और भारत के अटॉर्नी जनरल, राज्यों के महाधिवक्ताओं तथा केंद्रशासित प्रदेशों के स्थायी अधिवक्ताओं से अगली सुनवाई में सहायता प्रदान करने का अनुरोध किया।

Case Details

Case Title: Sarita Tyagi & Ors. v. Union of India & Ors.

Case Number: W.P.(C) No. 770/2026

Judges: Chief Justice of India Surya Kant and Justice V. Mohana

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