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उड़ीसा उच्च न्यायालय ने 1994 के खुर्दा गांव हत्याकांड में छह आरोपियों की आजीवन कारावास की सजा की पुष्टि की, जो मामूली झगड़े से शुरू हुआ था

Shivam Y.

दीनबंधु देहुरी एवं अन्य बनाम ओडिशा राज्य - उड़ीसा उच्च न्यायालय ने खुर्दा हत्या मामले में आजीवन कारावास की सजा बरकरार रखी, तथा निर्णय दिया कि गांव में झगड़े के कारण भीड़ द्वारा किया गया घातक हमला संदेह से परे साबित हुआ है।

उड़ीसा उच्च न्यायालय ने 1994 के खुर्दा गांव हत्याकांड में छह आरोपियों की आजीवन कारावास की सजा की पुष्टि की, जो मामूली झगड़े से शुरू हुआ था

ओडिशा हाईकोर्ट ने खुर्दा में लगभग तीन दशक पहले एक ग्रामीण की हत्या के दोषियों को दी गई उम्रकैद की सज़ा को बरकरार रखा है। न्यायमूर्ति एस.के. साहू और न्यायमूर्ति चित्तरंजन दाश द्वारा दिए गए इस फैसले ने दोहराया कि छोटी-सी तकरार भी यदि सही तरीके से नहीं सुलझाई जाए तो भयावह हिंसा में बदल सकती है।

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पृष्ठभूमि

मामला अगस्त 1994 का है, जब बेगुनिया थाना क्षेत्र के तंदालो गांव में एक वीडियो शो के दौरान विवाद खूनखराबे में बदल गया। अभियोजन के अनुसार, आरोपियों में से एक ने एक लड़की पर अशोभनीय टिप्पणी की, जिससे उसके परिवार ने विरोध जताया। जो मामूली झगड़ा था, वह जल्द ही दो गुटों के बीच हिंसक टकराव में बदल गया।

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भीड़ की हिंसा में कई घर तबाह कर दिए गए और ग्रामीण घायल हुए। सबसे चौंकाने वाली घटना लड़की के पिता जदुमणि बेहरा की निर्मम हत्या थी। गवाहों ने बताया कि आरोपी कुल्हाड़ी, लाठी और धारदार हथियारों से लैस होकर उसका पीछा करते हुए धान के खेत तक ले गए और वहां हमला कर दिया। बाद में उसका शव पास के खेत में पड़ा मिला।

मुकदमे के दौरान अभियोजन ने कई प्रत्यक्षदर्शियों और चिकित्सकीय विशेषज्ञों को पेश किया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कई कटने के घाव और हड्डी टूटने की पुष्टि हुई, जिससे यह साबित हुआ कि मौत हत्या की थी। खुर्दा की सत्र अदालत ने दीनबंधु देहुरी, श्रीधर बेहरा, टिकिना प्रधान, गोरंगा प्रधान, गगन प्रधान और माधव बेहरा को आईपीसी की धारा 147, 148 और 302/149 के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सज़ा सुनाई।

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दोषियों ने फैसले को चुनौती दी और कहा कि प्रत्यक्षदर्शियों के बयान विरोधाभासी हैं और चिकित्सकीय साक्ष्य पूरी तरह मेल नहीं खाते। बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि अधिकतम यह मामला हत्या का नहीं बल्कि गैर-इरादतन हत्या का है।

हाईकोर्ट ने इन तर्कों को खारिज करते हुए कहा:

"घातक हथियारों से लैस आरोपियों की सामूहिक कार्रवाई स्पष्ट रूप से उनके साझा उद्देश्य में भागीदारी को साबित करती है।"

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पीठ ने ज़ोर दिया कि गवाहों के बयानों में छोटे-मोटे विरोधाभास समग्र विश्वसनीयता को प्रभावित नहीं करते।

अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि,

"मृत्यु का कारण केवल सिर पर चोट नहीं थी, बल्कि धारदार और भाले जैसे हथियारों से लगी कई गंभीर चोटें भी थीं।"

गवाहों और चिकित्सकीय रिपोर्ट में सामंजस्य पाते हुए न्यायाधीशों ने दोषसिद्धि और सज़ा को बरकरार रखा।

केस का शीर्षक: दीनबंधु देहुरी एवं अन्य बनाम ओडिशा राज्य

केस संख्या: आपराधिक अपील (CRA) संख्या 02/1998

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