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अगर कानूनी प्रतिबंधों के कारण देरी हुई हो, तो मंज़ूरी की समय-सीमा के बाद निष्पादित बिक्री विलेख को अमान्य नहीं माना जा सकता

CB News Desk

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि कानूनी प्रतिबंध के कारण देरी से हुई बिक्री विलेख को स्वतः अवैध नहीं माना जा सकता और खरीदारों के पक्ष में नामांतरण का निर्देश दिया। - मिठाई लाल और अन्य बनाम डी.डी.सी. और अन्य

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अगर कानूनी प्रतिबंधों के कारण देरी हुई हो, तो मंज़ूरी की समय-सीमा के बाद निष्पादित बिक्री विलेख को अमान्य नहीं माना जा सकता
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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 53 वर्ष पुराने भूमि विवाद में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि यदि बिक्री विलेख (Sale Deed) निर्धारित समय-सीमा के बाद निष्पादित हुआ हो, लेकिन देरी कानूनी प्रतिबंधों के कारण हुई हो और बाद में स्वयं भूमि स्वामी ने रजिस्ट्री कर दी हो, तो केवल समय-सीमा पार होने के आधार पर उस हस्तांतरण को स्वतः अवैध नहीं माना जा सकता। अदालत ने 1978 से लंबित याचिका स्वीकार करते हुए खरीदारों के पक्ष में नामांतरण (Mutation) का निर्देश दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

विवाद मिर्जापुर जिले के ग्राम गुरसरडी स्थित चक संख्या 70 से संबंधित था। भूमि स्वामी ने 30 जून 1972 को सेटलमेंट ऑफिसर कंसोलिडेशन से भूमि हस्तांतरण की अनुमति प्राप्त की थी। आदेश में बिक्री विलेख 29 जुलाई 1972 तक निष्पादित करने की शर्त रखी गई थी।

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इसी बीच कृषि भूमि के हस्तांतरण पर कानूनी प्रतिबंध लागू हो गया। इसके कारण पक्षकारों ने 15 जुलाई 1972 को पंजीकृत एग्रीमेंट टू सेल किया। प्रतिबंध हटने के बाद 16 फरवरी 1973 को भूमि स्वामी ने खरीदारों के पक्ष में विधिवत पंजीकृत बिक्री विलेख निष्पादित कर दिया।

इसके बाद खरीदारों ने नामांतरण के लिए आवेदन किया, लेकिन कंसोलिडेशन अधिकारी ने यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि बिक्री विलेख अनुमति में निर्धारित समय के बाद किया गया था। अपील और पुनरीक्षण में भी यही निर्णय बरकरार रहा, जिसके बाद मामला हाई कोर्ट पहुंचा।

अदालत की टिप्पणियां

न्यायमूर्ति चंद्र कुमार राय ने उत्तर प्रदेश चकबंदी अधिनियम की उस समय लागू धारा 5(1)(c)(ii) और इस विषय पर पूर्व में दिए गए कई निर्णयों का विस्तृत परीक्षण किया।

अदालत ने कहा कि इस प्रावधान का उद्देश्य केवल चकबंदी के दौरान भूमि के अत्यधिक विभाजन (Fragmentation) को रोकना था, न कि वास्तविक और वैध हस्तांतरणों को केवल तकनीकी आधार पर अमान्य घोषित करना।

पीठ ने कहा,

"पूर्व अनुमति से जुड़ी किसी कमी के कारण हस्तांतरण स्वतः शून्य या कानूनी रूप से अप्रभावी नहीं हो जाता। ऐसी कमी को उचित परिस्थितियों में दूर किया जा सकता है।"

अदालत ने यह भी माना कि इस मामले में अनुमति पहले ही मिल चुकी थी। केवल उस समय लागू कानूनी प्रतिबंध के कारण बिक्री विलेख समय पर निष्पादित नहीं हो सका। प्रतिबंध समाप्त होते ही स्वयं भूमि स्वामी ने खरीदारों के पक्ष में पंजीकृत बिक्री विलेख कर दिया।

न्यायालय ने यह भी कहा कि जब विक्रेता स्वयं बिक्री विलेख निष्पादित कर चुका है, तब वह बाद में नामांतरण का विरोध कर खरीदारों को उस संपत्ति से वंचित नहीं कर सकता। हालांकि अदालत ने यह भी दर्ज किया कि पूरी भूमि के हस्तांतरण को लेकर दोनों पक्षों के बीच विवाद था।

अदालत का फैसला

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कंसोलिडेशन अधिकारी, सहायक सेटलमेंट अधिकारी (चकबंदी) और उप निदेशक चकबंदी द्वारा पारित सभी आदेशों को निरस्त कर दिया।

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अदालत ने कंसोलिडेशन अधिकारी, मिर्जापुर को निर्देश दिया कि वह कार्यवाही को पुनः बहाल करे और 16 फरवरी 1973 के पंजीकृत बिक्री विलेख के आधार पर याचिकाकर्ताओं का नाम राजस्व अभिलेखों में दर्ज करे। यह पूरी प्रक्रिया आदेश की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत किए जाने की तिथि से तीन महीने के भीतर पूरी करने का निर्देश दिया गया।

मामले में लागत (Costs) को लेकर कोई आदेश नहीं दिया गया।

Case Details

Case Title: Mithai Lal and Others v. D.D.C. and Others

Case Number: Writ-B No. 5744 of 1978

Judge: Justice Chandra Kumar Rai

Decision Date: July 1, 2026

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