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एक बार घरेलू हिंसा होने के बाद तलाक की डिक्री पति को घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत दायित्वों से मुक्त नहीं करती: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Shivam
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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया कि तलाक का आदेश मिलने से महिला का वह अधिकार अपने-आप खत्म नहीं हो जाता, जिसके तहत वह शादीशुदा रिश्ते के दौरान हुई कथित घटनाओं के लिए 'घरेलू हिंसा कानून' के तहत कानूनी उपाय अपना सकती है। - पी आर बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (प्रमुख सचिव, गृह, लखनऊ और अन्य के माध्यम से)

एक बार घरेलू हिंसा होने के बाद तलाक की डिक्री पति को घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत दायित्वों से मुक्त नहीं करती: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि विवाह के दौरान कथित रूप से घरेलू हिंसा की घटनाएं हुई हैं, तो बाद में पारित तलाक की डिक्री महिला के घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 (Protection of Women from Domestic Violence Act, 2005) के तहत उपलब्ध कानूनी अधिकारों और राहतों को समाप्त नहीं करती। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में तथ्यों और साक्ष्यों का परीक्षण ट्रायल कोर्ट द्वारा किया जाना चाहिए और केवल तलाक हो जाने के आधार पर कार्यवाही को समाप्त नहीं किया जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

आवेदक ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के तहत इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 12 के अंतर्गत लंबित शिकायत को रद्द करने की मांग की थी।

आवेदक का तर्क था कि पारिवारिक न्यायालय पहले ही क्रूरता के आधार पर विवाह विच्छेद (तलाक) का आदेश दे चुका है। साथ ही, पत्नी द्वारा लगाए गए आरोपों पर वैवाहिक मुकदमे में विचार किया जा चुका है, इसलिए घरेलू हिंसा की शिकायत उसी विवाद को दोबारा उठाने का प्रयास है।

आवेदक ने यह भी कहा कि तलाक के बाद दोनों पक्षों के बीच कोई वैधानिक घरेलू संबंध (Domestic Relationship) शेष नहीं रहा, इसलिए घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत कार्यवाही जारी नहीं रह सकती।

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अदालत की टिप्पणियां

न्यायमूर्ति बृज राज सिंह ने सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि घरेलू हिंसा अधिनियम का दायरा केवल उन महिलाओं तक सीमित नहीं है जो वर्तमान में साझा घर (Shared Household) में रह रही हैं। यह कानून उन महिलाओं की भी रक्षा करता है जो विवाह के दौरान किसी समय साझा घर में रह चुकी हैं और जिनके साथ उस अवधि में कथित घरेलू हिंसा हुई हो।

पीठ ने कहा,

"घरेलू हिंसा अधिनियम में 'घरेलू संबंध' की परिभाषा केवल वर्तमान में साथ रहने वाले व्यक्तियों तक सीमित नहीं है, बल्कि उन लोगों को भी शामिल करती है जो किसी समय साझा घर में साथ रह चुके हैं।"

अदालत ने आगे कहा,

"केवल इस आधार पर कि पति के पक्ष में तलाक की डिक्री पारित हो चुकी है, इस न्यायालय द्वारा इस स्तर पर पूरे मामले का सूक्ष्म परीक्षण (Mini Trial) कर कार्यवाही को रद्द नहीं किया जा सकता।"

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत मौद्रिक राहत, मुआवजा, बाल अभिरक्षा या अन्य राहतों से जुड़े मुद्दों का निर्णय साक्ष्यों के आधार पर ट्रायल कोर्ट द्वारा किया जाएगा।

अदालत का फैसला

सभी पक्षों की दलीलों और रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री पर विचार करने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पाया कि कार्यवाही को इस स्तर पर रद्द करने का कोई आधार नहीं बनता।

अदालत ने कहा कि यदि कथित घरेलू हिंसा विवाह के दौरान हुई है, तो बाद में पारित तलाक की डिक्री पति को घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 के तहत संभावित दायित्वों से स्वतः मुक्त नहीं करती।

इसलिए धारा 482 के तहत दायर याचिका निराधार पाई गई और उसे खारिज कर दिया गया। अदालत ने लागत (Costs) के संबंध में कोई आदेश पारित नहीं किया।

Case Details

Case Title: P. R. v. State of U.P. through Principal Secretary, Home, Lucknow & Another

Case Number: Application U/S 482 No. 6580 of 2025

Judge: Justice Brij Raj Singh

Decision Date: 7 July 2026

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