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इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अवैध पुलिस हिरासत की निंदा की, पारिवारिक विवाद में हिरासत में लिए गए व्यक्ति को ₹25k मुआवजा देने का आदेश दिया।

Shivam Y.

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने घरेलू विवाद के मामले में 24 घंटे की अवैध पुलिस हिरासत को मौलिक अधिकारों का उल्लंघन मानते हुए पीड़ित को ₹25,000 मुआवजा देने का आदेश दिया। - मातंबर मिश्रा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 3 अन्य

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इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अवैध पुलिस हिरासत की निंदा की, पारिवारिक विवाद में हिरासत में लिए गए व्यक्ति को ₹25k मुआवजा देने का आदेश दिया।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि केवल घरेलू विवाद के आधार पर किसी व्यक्ति को पुलिस हिरासत में रखना कानूनन स्वीकार्य नहीं है। अदालत ने पाया कि प्रयागराज निवासी मातंबर मिश्रा को लगभग 24 घंटे तक अवैध रूप से पुलिस लॉकअप में रखा गया था, न्यायालय ने कहा कि हिरासत संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिक के मौलिक अधिकार, व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन है। इसके लिए कोर्ट ने राज्य सरकार को ₹25,000 मुआवजा और ₹10,000 मुकदमे का खर्च देने का निर्देश दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता मातंबर मिश्रा ने हाईकोर्ट को बताया कि 26 नवंबर 2022 को पुलिस चौकी बारौत के तत्कालीन प्रभारी उन्हें उनके घर से लेकर गए और बाद में थाना हैंड़िया के लॉकअप में बंद कर दिया। उनका आरोप था कि यह कार्रवाई एक पारिवारिक विवाद से जुड़ी शिकायत के आधार पर की गई थी।

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मिश्रा ने यह भी कहा कि बाद में उनके खिलाफ दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 107/116 के तहत कार्यवाही शुरू की गई, जिसका उद्देश्य पहले की गई हिरासत को सही ठहराना था। उन्होंने पुलिस जांच रिपोर्ट पर भी सवाल उठाए, जिसमें उनकी शिकायत को खारिज कर दिया गया था।

न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति संजीव कुमार की खंडपीठ ने कहा कि धारा 107/116 की कार्यवाही सार्वजनिक शांति बनाए रखने के लिए होती है, न कि घरेलू या पारिवारिक विवादों के समाधान के लिए।

अदालत ने रिकॉर्ड का परीक्षण करते हुए पाया कि संबंधित पुलिस अधिकारी की ओर से इस आरोप का स्पष्ट खंडन नहीं किया गया कि याचिकाकर्ता को हिरासत में रखा गया था। इस पर कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में अवैध हिरासत का तथ्य स्वीकार किया हुआ माना जाएगा।

पीठ ने कहा, “अवैध हिरासत का तथ्य स्वीकार किया हुआ माना जाएगा।”

कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि शिकायत घरेलू हिंसा या पारिवारिक विवाद से संबंधित थी, तो उसका समाधान घरेलू हिंसा कानून के तहत उपलब्ध कानूनी उपायों से किया जाना चाहिए था। पुलिस को व्यक्ति को हिरासत में लेने का अधिकार नहीं था।

फैसले में अदालत ने कहा कि संबंधित पुलिस अधिकारी ने याचिकाकर्ता की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मूल अधिकार का गंभीर उल्लंघन किया है।

पीठ ने टिप्पणी की, “हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि पुलिस अधिकारी ने याचिकाकर्ता के मौलिक अधिकारों का लापरवाहीपूर्वक उल्लंघन किया।”

सभी तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता को 26 नवंबर 2022 से 27 नवंबर 2022 तक अवैध रूप से हिरासत में रखा गया था।

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अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह 30 दिनों के भीतर याचिकाकर्ता को ₹25,000 बतौर अंतरिम मुआवजा तथा ₹10,000 मुकदमे के खर्च के रूप में भुगतान करे।

साथ ही कोर्ट ने राज्य सरकार को यह स्वतंत्रता भी दी कि वह भुगतान की गई राशि संबंधित पुलिस अधिकारी से उचित प्रक्रिया के तहत वसूल सकती है, जिसमें उसके वेतन से कटौती भी शामिल हो सकती है।

Case Details

Case Title: Matambar Mishra vs The State of U.P. and 3 Others

Case Number: Criminal Misc. Writ Petition No. 3807 of 2023

Judges: Justice J.J. Munir and Justice Sanjiv Kumar

Decision Date: 29 May 2026

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