इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1998 में हुए एक हत्या मामले में दोषी ठहराए गए प्रवेश की अपील खारिज करते हुए उसकी सजा को बरकरार रखा है। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने प्रत्यक्षदर्शी गवाहों, चिकित्सकीय साक्ष्यों और अन्य रिकॉर्ड के आधार पर अपना मामला संदेह से परे साबित कर दिया है।
न्यायमूर्ति सलील कुमार राय और न्यायमूर्ति डॉ. अजय कुमार-II की खंडपीठ ने गाजियाबाद की सत्र अदालत द्वारा सुनाई गई दोषसिद्धि और सजा को सही ठहराया।
मामले की पृष्ठभूमि
अभियोजन के अनुसार, 10 अप्रैल 1998 को जगपाल सिंह अपने एक रिश्तेदार के साथ भूमि विवाद से जुड़े मुकदमे के संबंध में वकील से मिलने जा रहे थे। रास्ते में उन पर हमला किया गया, जिससे उनकी मृत्यु हो गई।
मामले की जड़ लगभग 1972 से चले आ रहे भूमि विवाद में थी। अभियोजन का कहना था कि मृतक का परिवार लंबे समय से चल रहे मुकदमे में सफल हुआ था और विवादित भूमि पर उसका अधिकार स्थापित हो गया था। इसी कारण आरोपी पक्ष में गहरी रंजिश पैदा हो गई थी।
जनवरी 2003 में ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को दोषी ठहराया था। अपील लंबित रहने के दौरान कुछ आरोपियों की मृत्यु हो गई, जिसके कारण उनके विरुद्ध कार्यवाही समाप्त हो गई। इसके बाद अपील केवल प्रवेश के संबंध में ही विचारणीय रह गई।
अपीलकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि अभियोजन ने एक महत्वपूर्ण प्रत्यक्षदर्शी गवाह रोहताश को अदालत में पेश नहीं किया। इसलिए अभियोजन के खिलाफ प्रतिकूल अनुमान लगाया जाना चाहिए।
बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि अभियोजन के गवाहों के बयानों में विरोधाभास हैं, चिकित्सकीय साक्ष्य पूरी तरह से कथित घटनाक्रम का समर्थन नहीं करते और पुरानी दुश्मनी के कारण प्रवेश को झूठा फंसाया गया है।
वहीं राज्य की ओर से कहा गया कि एफआईआर तत्काल दर्ज हुई थी, प्रत्यक्षदर्शी गवाहों के बयान भरोसेमंद हैं और चिकित्सकीय साक्ष्य भी अभियोजन की कहानी की पुष्टि करते हैं।
अदालत की टिप्पणी
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों का विस्तार से परीक्षण किया और पाया कि दोनों पक्षों के बीच लंबे समय से भूमि विवाद चल रहा था।
अदालत ने कहा कि विवादित भूमि को लेकर मुकदमेबाजी में अभियोजन पक्ष को सफलता मिली थी और इसी कारण आरोपी पक्ष में नाराजगी थी। अदालत ने माना कि यह घटना के पीछे एक महत्वपूर्ण कारण था।
पीठ ने कहा,
“अभियोजन पक्ष आरोपियों की ओर से मौजूद उद्देश्य को सफलतापूर्वक साबित करने में सक्षम रहा है।”
एफआईआर में देरी के तर्क को भी अदालत ने खारिज कर दिया। अदालत ने पाया कि घटना सुबह लगभग 8:45 बजे हुई थी और एफआईआर 10:30 बजे दर्ज कर ली गई थी, जिसे उसने तत्काल और स्वाभाविक माना।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी आपराधिक मुकदमे में गवाहों की संख्या नहीं, बल्कि उनकी गवाही की गुणवत्ता महत्वपूर्ण होती है।
पीठ ने कहा कि यदि प्रस्तुत किए गए गवाह विश्वसनीय हैं, तो केवल इस आधार पर अभियोजन का मामला कमजोर नहीं हो जाता कि किसी अन्य गवाह को पेश नहीं किया गया।
अदालत ने कहा कि महिपाल सिंह और श्री ओम की गवाही घटना के संबंध में पर्याप्त और भरोसेमंद है, इसलिए रोहताश के बयान के अभाव में भी अभियोजन का मामला प्रभावित नहीं होता।
साक्ष्यों का मूल्यांकन
हाईकोर्ट ने पाया कि दोनों प्रत्यक्षदर्शी गवाहों ने लंबी जिरह के दौरान भी अपने बयान में मूल घटनाक्रम को लेकर कोई महत्वपूर्ण विरोधाभास नहीं आने दिया।
अदालत ने यह भी नोट किया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में दर्ज गंभीर चोटें, विशेष रूप से सिर पर लगी घातक चोटें, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान से मेल खाती हैं। चिकित्सकीय साक्ष्य से यह भी स्पष्ट हुआ कि मृत्यु गंभीर चोटों के कारण हुई थी।
पीठ ने यह भी माना कि अभियोजन पक्ष प्रवेश की घटना में भागीदारी साबित करने में सफल रहा है और उसके विरुद्ध प्रस्तुत अन्य साक्ष्य भी विश्वसनीय हैं।
निर्णय में कहा गया,
“अभियोजन पक्ष अपीलकर्ता-दोषी के विरुद्ध अपना मामला संदेह से परे साबित करने में सफल रहा है।”
निर्णय
सभी तथ्यों और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट का फैसला साक्ष्यों पर आधारित और विधिसम्मत है। अदालत ने प्रवेश की अपील खारिज कर दी और उसकी दोषसिद्धि एवं सजा को बरकरार रखा।
इसके साथ ही न्यायालय ने निर्देश दिया कि अपीलकर्ता शेष सजा भुगतेगा। अपील को खारिज करते हुए मामले का निस्तारण कर दिया गया।
Case Details:
Case Title: Lila and Another v. State of Uttar Pradesh
Case Number: Criminal Appeal No. 462 of 2003
Judge: Justice Salil Kumar Rai and Justice Dr. Ajay Kumar-II
Decision Date: May 29, 2026
















