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'धारा 125 CrPC का उद्देश्य वैवाहिक मुकदमे का ट्रायल नहीं, बल्कि बेसहारा होने से बचाना है': इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पत्नी का भरण-पोषण बहाल किया

Shivam
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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक पत्नी के लिए गुज़ारा-भत्ता बहाल किया, दो नाबालिग बच्चों के लिए सहायता राशि बढ़ाई और यह कहा कि CrPC की धारा 125 के तहत कार्यवाही का मकसद वैवाहिक विवादों का निपटारा करने के बजाय बेसहारा होने की स्थिति को रोकना होना चाहिए। - श्रीमती रेनू और 2 अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य

'धारा 125 CrPC का उद्देश्य वैवाहिक मुकदमे का ट्रायल नहीं, बल्कि बेसहारा होने से बचाना है': इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पत्नी का भरण-पोषण बहाल किया

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत चलने वाली कार्यवाही का उद्देश्य पति-पत्नी के बीच लगाए गए हर आरोप की विस्तार से जांच करना नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से उपेक्षित आश्रितों को तत्काल राहत देना है। इसी सिद्धांत को लागू करते हुए अदालत ने फैमिली कोर्ट का वह आदेश रद्द कर दिया, जिसमें पत्नी को भरण-पोषण देने से इनकार कर दिया गया था। साथ ही दो नाबालिग बच्चों को मिलने वाली मासिक राशि भी बढ़ा दी गई।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला श्रीमती रेनू और उनके दो नाबालिग बच्चों द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका से जुड़ा है। बुलंदशहर के फैमिली कोर्ट ने दिसंबर 2023 में दिए अपने आदेश में पत्नी की भरण-पोषण की मांग खारिज कर दी थी। हालांकि, दोनों बच्चों के लिए ₹3,000-₹3,000 प्रतिमाह भरण-पोषण तय किया गया था।

पत्नी ने हाईकोर्ट में दलील दी कि फैमिली कोर्ट ने धारा 125 CrPC की संक्षिप्त प्रकृति को नजरअंदाज करते हुए मामले को ऐसे परखा, जैसे वह वैवाहिक विवाद का पूर्ण ट्रायल हो। उनका कहना था कि पति ने नवंबर 2020 के बाद किसी प्रकार का भरण-पोषण नहीं दिया और बच्चों के लिए तय की गई राशि भी वर्तमान परिस्थितियों में बेहद कम है।

न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद ने कहा कि धारा 125 CrPC के मामलों में अदालत को यह नहीं देखना होता कि पत्नी प्रत्येक आरोप को आपराधिक मुकदमे जैसी कठोर कसौटी पर साबित कर पाई या नहीं।

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अदालत ने कहा,

"धारा 125 CrPC की कार्यवाही को वैवाहिक विवाद के पूर्ण ट्रायल में नहीं बदला जा सकता। अदालत को केवल यह देखना होता है कि पत्नी के अलग रहने का उचित कारण है या नहीं और क्या पति ने उसके भरण-पोषण की उपेक्षा की है।"

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि पति स्वयं स्वीकार कर चुका था कि नवंबर 2020 के बाद उसने पत्नी और बच्चों को कोई भरण-पोषण नहीं दिया। इसके अलावा दोनों पक्षों के बीच लंबे समय से वैवाहिक विवाद और अलग-अलग रहने के तथ्य भी रिकॉर्ड पर मौजूद थे। ऐसे में यह नहीं कहा जा सकता कि पत्नी बिना उचित कारण के अलग रह रही थी।

फैसले में अदालत ने स्पष्ट किया कि पति द्वारा लगाए गए व्यभिचार (Adultery) के आरोप कभी साबित नहीं हुए।

पीठ ने कहा,

"केवल आरोप, संदेह या चरित्र पर सवाल उठाने भर से किसी पत्नी को भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता।"

अदालत ने यह भी माना कि पत्नी की स्वतंत्र आय होने का कोई विश्वसनीय प्रमाण रिकॉर्ड पर नहीं था। केवल इस आधार पर कि उसके माता-पिता उसकी मदद कर रहे हैं, पति अपनी कानूनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता।

हाईकोर्ट ने कहा कि स्कूल जाने वाले बच्चों की शिक्षा, भोजन, कपड़े, परिवहन और चिकित्सा जैसी आवश्यकताओं को देखते हुए ₹3,000 प्रतिमाह की राशि वास्तविक खर्चों के अनुरूप नहीं है।

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के रजनीश बनाम नेहा फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि भरण-पोषण की राशि केवल औपचारिक नहीं बल्कि ऐसी होनी चाहिए जिससे आश्रित सम्मानपूर्वक जीवन जी सकें।

हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश आंशिक रूप से रद्द करते हुए पत्नी को भी भरण-पोषण का अधिकार दिया।

अदालत ने निर्देश दिया कि पति निम्नलिखित राशि का भुगतान करेगा—

पत्नी को ₹5,000 प्रतिमाह

दोनों नाबालिग बच्चों को ₹4,000-₹4,000 प्रतिमाह

इस प्रकार कुल ₹13,000 प्रतिमाह भरण-पोषण 2 फरवरी 2021, यानी आवेदन दायर होने की तारीख से देय होगा। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि बकाया राशि पहले से किए गए भुगतान को समायोजित करने के बाद 12 समान मासिक किस्तों में अदा की जाएगी।

यदि भुगतान में चूक होती है तो पत्नी कानून के अनुसार पति की पेंशन या अन्य देय राशि से वसूली के लिए सक्षम अदालत का रुख कर सकती है।

Case Details

Case Title: Smt. Reenu and 2 Others v. State of U.P. and Another

Case Number: Criminal Revision No. 1370 of 2024

Judge: Justice Garima Prashad

Decision Date: June 17, 2026

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