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'भगोड़ापन' का आरोप गलत था: राजस्थान उच्च न्यायालय ने सीआरपीएफ कांस्टेबल की बहाली का आदेश दिया

Shivam
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हंस राज डोई बनाम भारत संघ और अन्य - राजस्थान उच्च न्यायालय ने सीआरपीएफ कांस्टेबल की बर्खास्तगी को रद्द करते हुए कहा कि छोटी चिकित्सा अनुपस्थिति को गलत तरीके से भगोड़ा मान लिया गया था; बिना पिछले वेतन के बहाली का आदेश दिया।

'भगोड़ापन' का आरोप गलत था: राजस्थान उच्च न्यायालय ने सीआरपीएफ कांस्टेबल की बहाली का आदेश दिया

जयपुर बेंच में सुनवाई के दौरान राजस्थान हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल (CRPF) के एक जवान की सेवा से हटाने की सज़ा रद्द कर दी। कोर्ट ने साफ कहा कि कुछ दिनों की गैरहाज़िरी, खासकर जब वह मेडिकल कारणों से हो और कर्मचारी खुद लौट आए, तो उसे “डेज़र्शन” यानी बल से भाग जाना नहीं माना जा सकता। अदालत ने विभाग के आदेशों को कानूनी रूप से गलत और प्रक्रिया के खिलाफ बताया।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता हंसराज दोई को 1995 में CRPF में कांस्टेबल के रूप में भर्ती किया गया था। उन्होंने अजमेर और अहमदाबाद में सेवा दी और कई बार सराहनीय काम के लिए इनाम भी पाया। गुजरात दंगों के बाद और भुज भूकंप राहत कार्यों में उनकी ड्यूटी की तारीफ भी हुई थी।

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2002 में विभाग ने उन पर चार आरोप लगाए। मुख्य आरोप यह था कि वह ट्रेनिंग के दौरान बिना अनुमति कैंप छोड़कर चले गए और करीब 20 दिन बाद लौटे। इसे “डेज़र्शन” बताया गया। बाकी आरोपों में कैंप के बाहर परिवार के साथ रहने और कथित अनुशासनहीनता की बातें थीं। विभागीय जांच के बाद उन्हें सेवा से हटा दिया गया। उनकी अपील और रिवीजन भी खारिज हो गए, जिसके बाद वह हाईकोर्ट पहुंचे।

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जवान की तरफ से कहा गया कि वह गंभीर किडनी दर्द से पीड़ित थे और अस्पताल में भर्ती रहे। उनकी पत्नी भी बीमार थी। इलाज के बाद वह खुद ड्यूटी पर लौट आए। वकील ने दलील दी कि यह “डेज़र्शन” नहीं हो सकता, क्योंकि डेज़र्शन का मतलब होता है हमेशा के लिए सेवा छोड़ने का इरादा। उन्होंने कहा, “जब कर्मचारी खुद वापस आ गया, तो स्थायी रूप से नौकरी छोड़ने की मंशा कैसे मानी जा सकती है?”

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यह भी बताया गया कि परिवार को कैंप के बाहर रखने की अनुमति पहले से दी गई थी, इसलिए दूसरा आरोप भी टिकता नहीं है।

सरकारी वकील ने कहा कि अनुशासन बल की रीढ़ है और बिना अनुमति गैरहाज़िरी गंभीर मामला है। उनके मुताबिक, जांच सही तरीके से हुई और सज़ा नियमों के तहत दी गई।

कोर्ट की टिप्पणी

जस्टिस आनंद शर्मा ने रिकॉर्ड देखने के बाद कहा कि चार्जशीट की बुनियाद ही गलत थी। कोर्ट ने टिप्पणी की, “डेज़र्शन तभी माना जाएगा जब कर्मचारी की मंशा हमेशा के लिए सेवा छोड़ने की हो। यहां तो कर्मचारी करीब 20 दिन बाद खुद ड्यूटी पर लौट आया।” अदालत ने यह भी कहा कि मेडिकल दस्तावेजों को ठीक से नहीं देखा गया और बचाव पक्ष के गवाहों को सुनने का पूरा मौका नहीं दिया गया।

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कोर्ट ने यह भी पाया कि जिस आरोप पर सबसे कड़ी सज़ा दी गई, वही कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं था। “जब आधार ही गलत हो, तो उस पर खड़ी पूरी कार्रवाई भी गिर जाती है,” अदालत ने कहा।

फैसला

हाईकोर्ट ने 2002 से 2003 के बीच पारित सभी दंडात्मक आदेश रद्द कर दिए और जवान को सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया। हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बीच की अवधि का वेतन नहीं मिलेगा, लेकिन सेवा की निरंतरता और सीनियरिटी बनी रहेगी।

विभाग को 60 दिनों के भीतर यह प्रक्रिया पूरी करने को कहा गया।

Case Title: Hans Raj Doi v. Union of India & Others

Case Number: S.B. Civil Writ Petition No. 7778/2006

Judgment Date: 3 February 2026

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