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मुर्शिदाबाद हिंसा: कलकत्ता हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को पीड़ितों को मुआवज़ा देने और स्थायी BSF कैंप की मांग पर विचार करने का निर्देश दिया

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मुर्शिदाबाद हिंसा: कलकत्ता हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को पीड़ितों को मुआवज़ा देने और स्थायी BSF कैंप की मांग पर विचार करने का निर्देश दिया

कलकत्ता हाईकोर्ट ने पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद ज़िले में वक्फ विरोधी विधेयक के विरोध के दौरान भड़की साम्प्रदायिक हिंसा को लेकर अहम आदेश जारी किया है। न्यायमूर्ति सौमेन सेन और न्यायमूर्ति राजा बसु चौधरी की खंडपीठ ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह हिंसा से प्रभावित सभी परिवारों को मुआवज़ा दे और उनके पुनर्वास की उचित व्यवस्था करे। अदालत ने स्थानीय लोगों द्वारा की गई स्थायी सीमा सुरक्षा बल (BSF) कैंप की मांग को भी गंभीरता से लेने का निर्देश दिया है।

यह मामला सुवेंदु अधिकारी बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (WPA(P) 153/2025) सहित कई जनहित याचिकाओं के माध्यम से न्यायालय के समक्ष आया था। सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह खुलासा हुआ कि शमशेरगंज थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले गांवों जैसे बेटबोना, घोषपाड़ा और पलपाड़ा में भयानक तोड़फोड़ और हिंसा हुई थी।

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"पीड़ितों की स्थिति अत्यंत दयनीय प्रतीत होती है। उनके घरों को क्षतिग्रस्त कर दिया गया, जीविका के स्रोत छीन लिए गए, और चल संपत्ति को लूट लिया गया। उनके चेहरों पर सदमा और भय साफ देखा गया," अदालत ने टिप्पणी की।

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केंद्र सरकार की ओर से प्रस्तुत हलफनामे में बताया गया कि हिंसा के कारण हिंदू समुदाय के 500 से अधिक लोग मुर्शिदाबाद से मालदा ज़िले की ओर पलायन करने को मजबूर हुए। खुफिया जानकारी के अनुसार राज्य के 15 ज़िलों में साम्प्रदायिक तनाव की आशंका जताई गई थी, जिसके बाद पहले से मौजूद 300 BSF जवानों के अलावा 5 अतिरिक्त कंपनियां तैनात की गईं। राज्य को सोशल मीडिया पर निगरानी रखने और ज़रूरत पड़ने पर अतिरिक्त केंद्रीय बलों की मांग करने की सलाह दी गई थी।

राज्य की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बंदोपाध्याय ने बताया कि हिंसा को नियंत्रित करने के लिए कई कदम उठाए गए हैं। 11 अप्रैल 2025 से अब तक 1093 सोशल मीडिया अकाउंट्स को ब्लॉक किया गया है। “बांग्लार बाड़ी योजना” के तहत 283 परिवारों के पुनर्निर्माण के लिए ₹3.69 करोड़ स्वीकृत किए गए हैं। प्रत्येक परिवार को ₹1.2 लाख का चेक और कुछ को सिलाई मशीनें मुख्यमंत्री द्वारा सौंपी गईं।

अदालत के पूर्व आदेश के अनुसार गठित समिति ने एक विस्तृत रिपोर्ट दाखिल की जिसमें बड़े पैमाने पर क्षति की जानकारी दी गई। रिपोर्ट में बताया गया कि बेटबोना गांव में करीब 100 घर पूरी तरह नष्ट हो गए हैं। घोषपाड़ा और पलपाड़ा में दुकानें, धार्मिक स्थल, राशन और बिजली के उपकरण की दुकानें भी बर्बाद कर दी गईं।

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यह तोड़फोड़ और हत्याएं पूर्व नियोजित और संगठित अपराध प्रतीत होती हैं, समिति की रिपोर्ट के आधार पर अदालत ने कहा।

समिति ने राज्य सरकार द्वारा सभी पीड़ितों को एक समान मुआवज़ा देने की नीति की आलोचना करते हुए कहा कि नुकसान की प्रकृति अलग-अलग है, इसलिए व्यक्तिगत मूल्यांकन आवश्यक है।

"सभी पीड़ितों को एक समान राशि देना न्यायसंगत नहीं होगा। नुकसान के वास्तविक आकलन के लिए विशेषज्ञ मूल्यांकनकर्ता की नियुक्ति ही एकमात्र समाधान है," समिति ने कहा।

अदालत ने इस सुझाव को स्वीकार करते हुए निर्देश दिया कि कलकत्ता हाईकोर्ट की सूची से एक वैल्यूअर नियुक्त किया जाए जो प्रभावित संपत्ति का आकलन कर रिपोर्ट दे। इसके सभी खर्च राज्य सरकार वहन करेगी। ज़िलाधिकारी और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) के सचिव को सहयोग करने का निर्देश दिया गया।

इसके साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि पीड़ितों को उनके घर तभी वापस भेजा जाए जब व्यवस्था में उनका विश्वास बहाल हो जाए। तब तक सरकार को उन्हें सुरक्षित और उपयुक्त आश्रय उपलब्ध कराना होगा। पीड़ितों की सूची सभी पक्षों को सौंपी जाए और राज्य सरकार मुआवज़ा और पुनर्वास की स्थिति पर प्रतिक्रिया दे।

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हिंसा की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने SIT को मामले की आगे जांच करने और समिति द्वारा सुझाए गए भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धाराएं—धारा 103(2), 113(2)(a) और (b)—को उचित मामलों में जोड़ने पर विचार करने का निर्देश दिया।

नुकसान की गंभीरता को देखते हुए तुरंत वैल्यूअर नियुक्त किया जाए और SIT से अपेक्षित है कि वह आगे गहन जांच करे क्योंकि अब तक की कार्रवाई हिंसा की व्यापकता से मेल नहीं खा रही है, अदालत ने कहा।

मामले की अगली सुनवाई 31 जुलाई 2025 को निर्धारित की गई है।

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