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सिर्फ संदेह पर सजा नहीं: गुवाहाटी हाई कोर्ट ने POCSO दोषसिद्धि रद्द की

Shivam
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गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने गवाहियों में विसंगतियों, एफआईआर दर्ज करने में देरी और पीड़िता की उम्र के संबंध में निर्णायक सबूतों के अभाव का हवाला देते हुए पीओसीएसओ के तहत दोषसिद्धि को रद्द कर दिया। - फकरुल इस्लाम बनाम असम राज्य और अन्य।

सिर्फ संदेह पर सजा नहीं: गुवाहाटी हाई कोर्ट ने POCSO दोषसिद्धि रद्द की

गुवाहाटी हाई कोर्ट ने हाल ही में एक फैसले में स्पष्ट किया कि आपराधिक मामलों में दोषसिद्धि के लिए ठोस, भरोसेमंद और एकरूप (consistent) साक्ष्य जरूरी होता है। केवल आरोप या संदेह के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला फकरुल इस्लाम द्वारा दायर अपील से जुड़ा था, जिन्हें निचली अदालत ने POCSO अधिनियम के तहत दोषी ठहराते हुए 10 साल की सजा दी थी।

अभियोजन के अनुसार, फरवरी 2018 में घटना हुई जब कथित तौर पर पीड़िता घर पर अकेली थी। शिकायत लगभग एक सप्ताह बाद दर्ज की गई, जब गांव स्तर पर समझौते की कोशिश असफल रही।

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ट्रायल के दौरान पीड़िता, उसके माता-पिता, डॉक्टर और जांच अधिकारी सहित कई गवाहों के बयान दर्ज किए गए।

अदालत के सामने मुख्य कानूनी मुद्दे

1. पीड़िता की उम्र

कोर्ट ने पाया कि उम्र का निर्धारण केवल मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर किया गया, जिसमें उम्र 16 से 18 वर्ष के बीच बताई गई थी।

अदालत ने कहा कि इस तरह का मेडिकल अनुमान सटीक नहीं होता और इसमें लगभग दो साल का अंतर संभव है। इसलिए इस संदेह का लाभ आरोपी को दिया जाना चाहिए।

इसी आधार पर कोर्ट ने माना कि POCSO कानून लागू करना उचित नहीं था।

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2. FIR दर्ज करने में देरी

एफआईआर दर्ज करने में करीब 7 दिन की देरी हुई। अदालत ने कहा कि इस देरी का पर्याप्त और ठोस कारण साबित नहीं किया गया।

कोर्ट ने कहा,

“अभियोजन यह साबित नहीं कर पाया कि वास्तव में कोई गांव की बैठक (बिचार) हुई थी।”

3. गवाही में विरोधाभास

अदालत ने पाया कि पीड़िता के बयान में महत्वपूर्ण अंतर थे। कोर्ट में दिया गया बयान और मजिस्ट्रेट के सामने दिया गया बयान पूरी तरह मेल नहीं खाते थे।

अदालत ने कहा कि ऐसे विरोधाभास होने पर बिना अतिरिक्त ठोस साक्ष्य के गवाही पर भरोसा करना सुरक्षित नहीं होता।

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4. सहायक गवाहों की भूमिका

कुछ गवाहों ने अदालत में अभियोजन का साथ नहीं दिया, जिससे मामला और कमजोर हो गया।

इसके अलावा, जिन स्वतंत्र गवाहों का जिक्र किया गया था (जैसे गांव का प्रधान), उन्हें अदालत में पेश नहीं किया गया।

5. मेडिकल साक्ष्य

मेडिकल रिपोर्ट में हालिया चोट या जबरन संबंध के स्पष्ट संकेत नहीं मिले। अदालत ने इसे भी समग्र साक्ष्य के मूल्यांकन में महत्वपूर्ण माना।

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हाई कोर्ट ने कहा कि आपराधिक मामलों में “संदेह से परे” (beyond reasonable doubt) प्रमाण जरूरी होता है।

कोर्ट ने कहा,

“रिकॉर्ड में मौजूद साक्ष्यों में कई खामियां और विरोधाभास हैं, जो उचित संदेह पैदा करते हैं।”

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायालय अनुमान के आधार पर दोष तय नहीं कर सकता।

सभी तथ्यों और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद हाई कोर्ट ने निचली अदालत का फैसला रद्द कर दिया।

अपील स्वीकार की गई और आरोपी को रिहा करने का निर्देश दिया गया। अदालत ने माना कि उपलब्ध साक्ष्य दोषसिद्धि बनाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं थे।

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