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लोक अदालत में वकील की सहमति काफी नहीं, पक्षकार की मौजूदगी जरूरी: गुवाहाटी हाईकोर्ट का अहम फैसला

Vivek G.
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महिंद्रा एंड महिंद्रा फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड बनाम हकीम उद्दीन, गुवाहाटी हाईकोर्ट ने कहा कि लोक अदालत में बिना पक्षकार की मौजूदगी के हुआ समझौता अमान्य है। जानिए पूरा फैसला और कानूनी महत्व।

लोक अदालत में वकील की सहमति काफी नहीं, पक्षकार की मौजूदगी जरूरी: गुवाहाटी हाईकोर्ट का अहम फैसला

गुवाहाटी हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि राष्ट्रीय लोक अदालत में किसी मामले का निपटारा तभी वैध माना जाएगा जब संबंधित पक्ष स्वयं या उसका अधिकृत प्रतिनिधि मौजूद हो। केवल वकील की मौजूदगी के आधार पर हुआ समझौता कानूनन टिकाऊ नहीं है। अदालत ने इस आधार पर उपभोक्ता आयोग की लोक अदालत में पारित आदेश को रद्द कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला महिंद्रा एंड महिंद्रा फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड और हकीम उद्दीन से जुड़ा है। विवाद की शुरुआत उपभोक्ता फोरम, गोलपाड़ा में दर्ज एक शिकायत से हुई थी, जिसमें कंपनी के खिलाफ एकतरफा आदेश पारित किया गया था।

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इस आदेश को चुनौती देते हुए कंपनी ने असम राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग में अपील दायर की। यह अपील राष्ट्रीय लोक अदालत (14 सितंबर 2024) में रखी गई, जहां कथित रूप से समझौता हो गया और उसी आधार पर मामला निपटा दिया गया।

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हालांकि, कंपनी का कहना था कि-

• लोक अदालत में उसका कोई अधिकृत अधिकारी मौजूद नहीं था

• वकील ने बिना अनुमति समझौता कर लिया

• कंपनी ने किसी तरह की लिखित सहमति नहीं दी थी

इसके बाद कंपनी ने गुवाहाटी हाईकोर्ट का रुख किया।

अदालत का अवलोकन

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति संजय कुमार मेधी ने की। अदालत ने लोक अदालत के आदेशों की कानूनी स्थिति पर विस्तार से विचार किया।

कोर्ट ने कहा-

“लोक अदालत का उद्देश्य पक्षकारों की आपसी सहमति से विवाद का निपटारा करना है। इसमें दोनों पक्षों की स्वतंत्र और स्पष्ट सहमति आवश्यक है।”

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कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल वकील की उपस्थिति या मौखिक सहमति को पक्षकार की सहमति नहीं माना जा सकता, जब तक उसके पास लिखित प्राधिकरण न हो।

न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि:

• लोक अदालत का फैसला अंतिम होता है

• लेकिन यदि समझौता वास्तविक सहमति के बिना हुआ हो, तो उसे संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत चुनौती दी जा सकती है

कोर्ट ने रिकॉर्ड मंगाकर देखा और पाया कि-

• किसी प्रकार का ऑथरिटी लेटर मौजूद नहीं था

• यह प्रमाण नहीं मिला कि कंपनी ने वकील को समझौता करने की अनुमति दी थी

फ़ैसला

इन तथ्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने कहा कि-

“लोक अदालत में हुआ समझौता कानून की भावना के अनुरूप नहीं है क्योंकि उसमें पक्षकार की भागीदारी नहीं थी।”

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अदालत ने:

• 14 सितंबर 2024 को पारित लोक अदालत के आदेश को रद्द कर दिया

• उपभोक्ता आयोग को निर्देश दिया कि वह अपील पर कानून के अनुसार दोबारा सुनवाई करे

• यह भी कहा कि मामला 2018 से लंबित है, इसलिए इसका शीघ्र निपटारा किया जाए

इसी के साथ याचिका का निपटारा कर दिया गया।

Case Title: Mahindra & Mahindra Financial Services Ltd vs Hakim Uddin

Case No.: WP(C) 4029/2025

Decision Date: 08 January 2026

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