गौहाटी हाई कोर्ट की एक खंडपीठ ने एक व्यक्ति की आपराधिक अपील खारिज कर दी है, जिसे 9 साल की बच्ची पर गंभीर यौन उत्पीड़न का दोषी ठहराया गया था। अदालत ने 20 साल की कठोर कारावास की सजा को बरकरार रखते हुए कहा कि पीड़िता की स्पष्ट अदालती गवाही ही दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त है - भले ही मेडिकल रिपोर्ट अनिर्णायक रही हो।
यह फैसला 26 मई 2025 को न्यायमूर्ति माइकल जोथानखुमा और न्यायमूर्ति संजीव कुमार शर्मा की खंडपीठ ने सुनाया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला असम के बारपेटा जिले से जुड़ा है। आरोपी सतीश राय उर्फ सतीश मंडल को बारपेटा की अपर सत्र न्यायाधीश-सह-विशेष न्यायाधीश (POCSO) अदालत ने स्पेशल POCSO केस नंबर 66/2020 में दोषी करार दिया था।
उसे POCSO अधिनियम की धारा 6 और भारतीय दंड संहिता की धारा 376(AB) के तहत दोषी पाया गया था। ट्रायल कोर्ट ने उसे 20 साल की कठोर कारावास और 10,000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई थी। इसी सजा को चुनौती देते हुए आरोपी ने गौहाटी हाई कोर्ट में अपील दायर की थी।
बचाव पक्ष की दलीलें
अपीलकर्ता के वकील श्री आर. अली ने दो मुख्य आधारों पर सजा को चुनौती दी।
पहली दलील यह थी कि पीड़िता ने CrPC की धारा 164 के तहत मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज अपने बयान में केवल "बुरा काम" शब्द का इस्तेमाल किया था। वकील का तर्क था कि यह अस्पष्ट शब्द अकेले यह साबित नहीं करता कि यौन संबंध बनाए गए।
दूसरी दलील मेडिकल रिपोर्ट पर आधारित थी। जांच करने वाली डॉक्टर (PW-6) ने पाया था कि पीड़िता की हाइमन अक्षुण्ण थी और शरीर पर कोई चोट के निशान नहीं थे। बचाव पक्ष ने कहा कि इससे बलात्कार की घटना साबित नहीं होती।
अदालत की टिप्पणियां
खंडपीठ ने दोनों दलीलों की गहराई से जांच की और उन्हें अस्वीकार कर दिया।
"बुरा काम" वाले सवाल पर अदालत ने पीड़िता के पूरे धारा 164 बयान का संदर्भ देखा। पीड़िता ने बताया था कि उसे जबरदस्ती मवेशी बांधने वाले तंबू में खींचा गया, उसका मुंह कपड़े से बांधा गया, हाथ बांधे गए और कपड़े उतारे गए - इसके बाद "बुरा काम" किया गया।
खंडपीठ ने कहा कि यह वाक्यांश उसकी अदालती गवाही के साथ मिलकर - जहां उसने घटना का स्पष्ट विवरण दिया - अलगाव में नहीं पढ़ा जा सकता।
अदालत ने शाह आलम बनाम असम राज्य मामले से इसे अलग करते हुए कहा कि उस मामले में पीड़िता मजिस्ट्रेट के बार-बार पूछने पर भी "बुरा काम" का मतलब नहीं बता पाई थी और चुप रही। यहां परिस्थितियां बिल्कुल अलग हैं।
मेडिकल साक्ष्य के सवाल पर अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला दिया। स्टेट ऑफ हिमाचल प्रदेश बनाम मंगा सिंह (2019) और वाहिद खान बनाम स्टेट ऑफ मध्य प्रदेश (2010) का उल्लेख करते हुए पीठ ने दोहराया कि हाइमन का अक्षुण्ण होना यौन उत्पीड़न की अनुपस्थिति साबित नहीं करता।
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि POCSO अधिनियम की धारा 3 के तहत "प्रवेशात्मक यौन उत्पीड़न" के लिए पूर्ण प्रवेश जरूरी नहीं है - मामूली सा प्रवेश भी कानूनी रूप से पर्याप्त माना जाता है। हाइमन के आसपास की लालिमा और छूने पर दर्द इसी की ओर संकेत कर सकते हैं।
लतेश @ दादू बाबूराव कार्लेकर बनाम स्टेट ऑफ महाराष्ट्र का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि मौखिक गवाही मेडिकल साक्ष्य से ऊपर होती है - जब तक कि मेडिकल रिपोर्ट घटना की किसी भी संभावना को पूरी तरह नकार न दे।
अदालत का फैसला
गौहाटी हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले में दखल देने का कोई कारण नहीं पाया। अपील खारिज कर दी गई और 20 साल की कठोर कारावास की सजा बरकरार रखी गई। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि एमिकस क्यूरी श्री एस.एन. तामुली की फीस गौहाटी हाई कोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी द्वारा नियमानुसार अदा की जाए।
Case Details:
Case Title: Satish Ray (Mandal) @ Satish Mandal @ Satish Ch Ray vs. The State of Assam & Anr.
Case Number: Crl.A./267/2023
Bench: Justice Michael Zothankhuma & Justice Sanjeev Kumar Sharma
Decision Date: May 26, 2025




