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जूनियर सिविल जज को तलाक़ की डिक्री देने का अधिकार नहीं: गुवाहाटी हाईकोर्ट का अहम फ़ैसला

CB News Desk

जावेद परवेज़ चौधरी बनाम बेगम नजीफा यास्मीन चौधरी - गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के पास तलाक को वैध ठहराने या विवाह भंग करने का अधिकार नहीं है; अधिकार क्षेत्र के अभाव में डिक्री को अमान्य घोषित किया गया।

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जूनियर सिविल जज को तलाक़ की डिक्री देने का अधिकार नहीं: गुवाहाटी हाईकोर्ट का अहम फ़ैसला
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गुवाहाटी हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फ़ैसले में साफ़ कर दिया है कि वैवाहिक विवादों में तलाक़ जैसी राहत देने का अधिकार जूनियर सिविल जज (Jr. Division) को नहीं है। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में केवल फैमिली कोर्ट या, उसके अभाव में, ज़िला न्यायालय ही सक्षम मंच है।

यह निर्णय जावेद परवेज़ चौधरी बनाम बेगम नजीफ़ा यास्मिन चौधरी मामले में सुनाया गया, जिसमें निचली अदालत द्वारा दी गई तलाक़ संबंधी घोषणा को अधिकार क्षेत्र (ज्यूरिस्डिक्शन) के आधार पर रद्द कर दिया गया था।

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मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता पति ने हाइलाकांडी की जूनियर सिविल जज अदालत में एक वाद दायर कर यह घोषणा मांगी थी कि उनके द्वारा तीन अलग-अलग तारीख़ों पर लिखित रूप से दिया गया तलाक़ (तलाक़-ए-हसन) वैध है और विवाह समाप्त हो चुका है।

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निचली अदालत ने पत्नी की अनुपस्थिति में मामला एकतरफ़ा (एक्स-पार्टी) चलाया और यह कहते हुए डिक्री दे दी कि विवाह तलाक़ के ज़रिए समाप्त हो चुका है। इसके ख़िलाफ़ पत्नी ने सीनियर सिविल जज की अदालत में अपील की, जहाँ यह कहते हुए निचली अदालत का फ़ैसला पलट दिया गया कि जूनियर सिविल जज को ऐसे वैवाहिक मामलों की सुनवाई का अधिकार ही नहीं था।

हाईकोर्ट के सामने मुख्य क़ानूनी प्रश्न यह था कि -

क्या जूनियर सिविल जज द्वारा दिए गए तलाक़ संबंधी फ़ैसले को अधिकार क्षेत्र के अभाव में रद्द करना सही था, ख़ासकर तब जब ज़िले में फैमिली कोर्ट मौजूद नहीं है?

अदालत की अहम टिप्पणियाँ

न्यायमूर्ति मिताली ठाकुरिया ने रिकॉर्ड का गहन परीक्षण करते हुए कहा कि भले ही वाद को “घोषणात्मक” बताया गया हो, लेकिन वास्तविकता में निचली अदालत ने विवाह को भंग करने की स्पष्ट डिक्री दे दी थी।

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अदालत ने टिप्पणी की,

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“केवल यह कह देने से कि मामला घोषणा का है, उसकी प्रकृति नहीं बदल जाती। यदि परिणाम तलाक़ की डिक्री है, तो वह वैवाहिक विवाद ही माना जाएगा।”

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि फैमिली कोर्ट अधिनियम, 1984 के तहत तलाक़, विवाह-विच्छेद और अन्य वैवाहिक विवाद केवल फैमिली कोर्ट में सुने जाने चाहिए। यदि किसी ज़िले में फैमिली कोर्ट नहीं है, तो यह अधिकार ज़िला न्यायालय को प्राप्त होता है, न कि जूनियर सिविल जज को।

अपीलकर्ता की ओर से सुप्रीम कोर्ट के कुछ पुराने फ़ैसलों का हवाला दिया गया, जिनमें सिविल अदालत की घोषणात्मक अधिकारिता की बात कही गई थी। लेकिन हाईकोर्ट ने साफ़ किया कि वे फ़ैसले उन मामलों पर लागू होते हैं जहाँ केवल वैवाहिक स्थिति की घोषणा मांगी जाती है, न कि सीधे तौर पर तलाक़ की पुष्टि।

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अंतिम निर्णय

सभी दलीलों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने सीनियर सिविल जज के फ़ैसले को सही ठहराया और कहा कि जूनियर सिविल जज द्वारा दी गई तलाक़ की डिक्री अधिकार क्षेत्र के अभाव में शून्य (नलिटी) है।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पक्षकार उचित मंच - यानी फैमिली कोर्ट या ज़िला न्यायालय - के समक्ष अपनी राहत के लिए स्वतंत्र हैं। इसके साथ ही, पति की ओर से दायर दूसरी अपील को ख़ारिज कर दिया गया।

Case Title: Javed Pervez Choudhury v. Begum Najifa Yasmin Choudhury

Case Number: RSA/131/2025

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