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न्यायिक अधिकारी के खिलाफ जांच शुरू करने के लिए अनिवार्य हलफनामा जरूरी नहीं: गुजरात उच्च न्यायालय

Shivam Y.

गुजरात हाईकोर्ट ने अतिरिक्त जिला न्यायाधीश की विभागीय जांच रद्द करने की मांग ठुकराते हुए कहा कि जांच शुरू करने के लिए लिखित शिकायत जरूरी नहीं है।

न्यायिक अधिकारी के खिलाफ जांच शुरू करने के लिए अनिवार्य हलफनामा जरूरी नहीं: गुजरात उच्च न्यायालय
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गुजरात हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में एक कार्यरत अतिरिक्त जिला न्यायाधीश द्वारा दायर याचिका खारिज कर दी, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ चल रही विभागीय जांच रद्द करने, निलंबन आदेश खत्म करने और जांच किसी अन्य वरिष्ठ न्यायाधीश को सौंपने की मांग की थी। अदालत ने कहा कि न्यायिक अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच शुरू करने के लिए लिखित शिकायत और शपथपत्र अनिवार्य नहीं है, यदि अनुशासनात्मक प्राधिकरण के पास पर्याप्त आधार मौजूद हों।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता, जो उस समय अतिरिक्त जिला न्यायाधीश के पद पर कार्यरत थे, को दिसंबर 2024 में प्रस्तावित विभागीय कार्रवाई के चलते निलंबित किया गया था। जनवरी 2025 में उनके खिलाफ छह आरोपों वाली चार्जशीट जारी हुई। आरोपों में एक आउटसोर्स क्लर्क के साथ निकट संबंध रखने, उसे आर्थिक सहायता देने, अदालत के कर्मचारियों का निजी कार्यों में उपयोग करने और न्यायालय की कार्यवाही के दौरान अनुचित व्यवहार जैसे आरोप शामिल थे।

याचिकाकर्ता ने इन आरोपों को नकारते हुए जांच समाप्त करने की मांग की थी। उन्होंने पहले भी सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था, लेकिन बाद में याचिकाएं वापस ले ली थीं। इसके बाद उन्होंने गुजरात हाईकोर्ट में वर्तमान याचिका दाखिल की।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता पर्सी कविना ने दलील दी कि किसी न्यायिक अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच तभी शुरू हो सकती है जब शिकायत लिखित रूप में हो और उसके साथ शपथपत्र तथा सत्यापन योग्य सामग्री हो। उन्होंने 2014 की उन गाइडलाइंस का हवाला दिया, जो न्यायपालिका के खिलाफ शिकायतों के संबंध में जारी की गई थीं।

हालांकि, हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। पीठ ने कहा,

“अनुशासनात्मक प्राधिकरण को यदि किसी न्यायिक अधिकारी के आचरण के बारे में पर्याप्त जानकारी प्राप्त होती है, तो वह विभागीय जांच शुरू कर सकता है। इसके लिए लिखित शिकायत अनिवार्य नहीं है।”

अदालत ने स्पष्ट किया कि 2014 की गाइडलाइंस मुख्य रूप से असंतुष्ट वादकारियों द्वारा की जाने वाली शिकायतों के लिए थीं, ताकि झूठे या दुर्भावनापूर्ण आरोपों को रोका जा सके। न्यायालय ने कहा कि इन दिशा-निर्देशों का उपयोग विभागीय कार्रवाई रोकने के “ढाल” के रूप में नहीं किया जा सकता।

पीठ ने यह भी कहा कि चार्जशीट की वैधता या आरोपों की कथित अस्पष्टता की जांच इस स्तर पर नहीं की जा सकती। अदालत ने कहा कि यह मुद्दा जांच अधिकारी के समक्ष उठाया जा सकता है।

फैसले के दौरान अदालत ने याचिकाकर्ता द्वारा दायर एक लिखित प्रस्तुति का भी उल्लेख किया, जिसमें एक वरिष्ठ हाईकोर्ट न्यायाधीश के संबंध में टिप्पणियां की गई थीं। पीठ ने इसे न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाला बताया।

अदालत ने कहा,

“यह आरोप कि एक वरिष्ठ न्यायाधीश अपने कनिष्ठ न्यायाधीशों को निर्देशित कर सकते हैं, न्यायालय की प्रतिष्ठा को कम करने वाला है और प्रथम दृष्टया आपराधिक अवमानना का मामला बनता है।”

गुजरात हाईकोर्ट ने विभागीय जांच रद्द करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। साथ ही अदालत ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता की लिखित टिप्पणियों के संबंध में अवमानना कार्यवाही शुरू करने पर विचार करने के लिए मामला संबंधित अवमानना पीठ के समक्ष रखा जाए।

अदालत ने याचिकाकर्ता को अगली तारीख पर व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहने का भी निर्देश दिया।

Case Details

Case Title: X v. High Court of Gujarat Through Registrar General

Case Number: R/Special Civil Application No. 5112 of 2026

Judges: Justice N.S. Sanjay Gowda and Justice J.L. Odedra

Decision Date: May 8, 2026

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