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गुजरात हाईकोर्ट ने 2002 दंगा हत्या मामले में सभी आरोपियों की बरी होने की अपील खारिज की

Rajan Prajapati
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गुजरात हाईकोर्ट ने 2002 दंगा हत्या मामले में राज्य की अपील खारिज कर दी, ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपियों को बरी करने के फैसले को सही ठहराया। - गुजरात राज्य बनाम फिलिपभाई मंगलभाई मिस्त्री और अन्य।

गुजरात हाईकोर्ट ने 2002 दंगा हत्या मामले में सभी आरोपियों की बरी होने की अपील खारिज की

गुजरात हाईकोर्ट ने 2002 के गोधरा कांड के बाद भड़की हिंसा से जुड़े एक आपराधिक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी। अदालत ने निचली अदालत द्वारा आरोपियों को दी गई बरी को बरकरार रखा।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 27 फरवरी 2002 को गोधरा में ट्रेन जलाए जाने की घटना के बाद राज्य में भड़की हिंसा से जुड़ा है। अभियोजन के अनुसार, 28 फरवरी 2002 को वडोदरा में बंद के दौरान एक भीड़ ने एक व्यक्ति के घर और दुकान पर हमला किया।

अभियोजन का आरोप था कि भीड़ ने संपत्ति को नुकसान पहुंचाया और आगजनी की, जिसमें एक व्यक्ति की मृत्यु हो गई। इस संबंध में भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया और बाद में सत्र न्यायालय में सुनवाई हुई।

वडोदरा की सत्र अदालत ने 5 मार्च 2003 को सभी आरोपियों को बरी कर दिया था। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर आरोपों को संदेह से परे साबित करने में सफल नहीं रहा।

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इस फैसले को चुनौती देते हुए राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।

हाईकोर्ट ने अपील पर सुनवाई के दौरान रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों और गवाहों के बयानों की विस्तृत समीक्षा की। राज्य की ओर से दलील दी गई कि ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों का सही मूल्यांकन नहीं किया।

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हालांकि, अदालत ने पाया कि:

• मेडिकल और फोरेंसिक साक्ष्य निर्णायक नहीं थे और मृतक की पहचान स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं हो सकी।

• प्रत्यक्षदर्शी गवाहों द्वारा आरोपियों की पहचान में स्पष्टता का अभाव था।

• घटना बड़ी भीड़ और तनावपूर्ण परिस्थितियों में हुई, जिससे पहचान को लेकर संदेह बना रहा।

बेंच ने कहा,

“यदि ट्रायल कोर्ट द्वारा अपनाया गया दृष्टिकोण संभावित और तर्कसंगत है, तो अपीलीय अदालत को उसमें हस्तक्षेप करने की आवश्यकता नहीं होती।”

अदालत ने यह भी दोहराया कि आपराधिक मामलों में संदेह का लाभ आरोपी को दिया जाना एक स्थापित सिद्धांत है।

सभी तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट का निष्कर्ष रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों के अनुरूप है और उसमें हस्तक्षेप का कोई कारण नहीं बनता।

अदालत ने राज्य की अपील खारिज कर दी और ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपियों को दी गई बरी को बरकरार रखा।

अपील खारिज करते हुए मामला निपटाया गया।

Case Details

Case Title: State of Gujarat vs Fillipbhai Magalbhai Mistry & Ors.

Case Number: R/Criminal Appeal No. 697 of 2003

Judge: Justice Nirzar S. Desai & Justice D.N. Ray

Decision Date: 18 April 2026

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