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गुजरात उच्च न्यायालय ने नारायण साई की पांचवीं जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि दोषी ने अपील की सुनवाई में ‘देरी करने की रणनीति’ अपनाई।

Shivam
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गुजरात हाईकोर्ट ने नारायण साईं की सजा निलंबित कर जमानत देने से इनकार करते हुए कहा कि अपील में देरी के लिए स्वयं दोषी जिम्मेदार है। - नारायण @ नारायण साईं @ मोटा भगवान बनाम गुजरात राज्य एवं अन्य।

गुजरात उच्च न्यायालय ने नारायण साई की पांचवीं जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि दोषी ने अपील की सुनवाई में ‘देरी करने की रणनीति’ अपनाई।

गुजरात हाईकोर्ट ने आसाराम के पुत्र नारायण साईं की सजा निलंबित कर जमानत देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने कहा कि दोषी खुद अपील की सुनवाई में देरी के लिए जिम्मेदार रहा है और बार-बार अलग-अलग आवेदन दाखिल कर प्रक्रिया को लंबा खींचता रहा।

यह आदेश न्यायमूर्ति इलेश जे. वोरा और न्यायमूर्ति आर. टी. वच्छानी की खंडपीठ ने 4 मई 2026 को पारित किया। मामला नारायण साईं द्वारा दायर पांचवीं लगातार जमानत याचिका से जुड़ा था।

मामले की पृष्ठभूमि

अभियोजन के अनुसार, शिकायतकर्ता महिला और उसका परिवार 2001 में सूरत स्थित आश्रम में धार्मिक कार्यक्रम में शामिल हुआ था। वहीं से उसकी पहचान नारायण साईं से हुई। बाद में महिला को मध्य प्रदेश और बिहार स्थित आश्रमों में भेजा गया, जहां उसके साथ कथित यौन शोषण और दुष्कर्म की घटनाएं हुईं।

एफआईआर 6 अक्टूबर 2013 को सूरत के जहांगीरपुरा पुलिस स्टेशन में दर्ज हुई थी। ट्रायल कोर्ट ने 30 अप्रैल 2019 को नारायण साईं को आईपीसी की विभिन्न धाराओं, जिनमें धारा 376(2)(c) और 377 शामिल हैं, के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी।

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नारायण साईं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने अदालत में कहा कि वह 11 वर्ष से अधिक समय जेल में बिता चुका है और अपील की सुनवाई में अभी और समय लग सकता है। बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि शिकायतकर्ता के बयान में विरोधाभास हैं, एफआईआर दर्ज करने में अत्यधिक देरी हुई और अभियोजन के कई महत्वपूर्ण गवाह पेश नहीं किए गए।

याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि ट्रायल कोर्ट ने बचाव पक्ष के साक्ष्यों का सही तरीके से मूल्यांकन नहीं किया। स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का हवाला भी दिया गया।

हाईकोर्ट ने कहा कि दोषसिद्धि के बाद “निर्दोष होने की प्रारंभिक धारणा” समाप्त हो जाती है और इस स्तर पर सबूतों का दोबारा विस्तृत मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा:

“मामले की गंभीरता और आरोपों की प्रकृति को देखते हुए प्रथम दृष्टया यह कहना कठिन है कि दोषी के बरी होने की उचित संभावना है।”

खंडपीठ ने यह भी कहा कि लंबी कैद का आधार यहां स्वतः राहत देने के लिए पर्याप्त नहीं है, क्योंकि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि अपील की सुनवाई में देरी के लिए स्वयं दोषी का आचरण जिम्मेदार रहा।

अदालत ने नोट किया कि 2019 से अब तक कई बार अपील अंतिम सुनवाई के लिए सूचीबद्ध हुई, लेकिन हर बार अलग-अलग आवेदन दाखिल किए गए या सुनवाई टाली गई। आदेश में कहा गया कि यह “देरी की रणनीति” प्रतीत होती है।

गुजरात हाईकोर्ट ने कहा कि मामले में सजा निलंबित करने या जमानत देने के लिए कोई पर्याप्त आधार नहीं बनता। इसके साथ ही नारायण साईं की याचिका खारिज कर दी गई। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आदेश में की गई टिप्पणियां केवल इस आवेदन तक सीमित हैं और अपील की अंतिम सुनवाई को प्रभावित नहीं करेंगी।

Case Details:

Case Title: Narayan @ Narayan Sai @ Mota Bhagwan v. State of Gujarat & Anr.

Case Number: Criminal Misc. Application (For Suspension of Sentence) No. 4 of 2025 in Criminal Appeal No. 1756 of 2019

Judges: Justice Ilesh J. Vora and Justice R.T. Vachhani

Decision Date: May 4, 2026

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