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CCTV फुटेज से झूठे आरोप का पर्दाफ़ाश, गुजरात हाईकोर्ट ने वकील के खिलाफ हत्या के प्रयास की FIR रद्द की

Shivam Y.

गुजरात हाई कोर्ट ने आपराधिक साजिश के आरोपी एक वकील के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द कर दिया। कोर्ट ने माना कि CCTV फुटेज मुख्य आरोपों के उलट थी और ऐसा कोई स्वतंत्र सबूत नहीं था जो उन्हें कथित अपराध से जोड़ता हो। - मोहम्मद बिलाल गुलाम रसूल कागज़ी बनाम गुजरात राज्य और अन्य।

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CCTV फुटेज से झूठे आरोप का पर्दाफ़ाश, गुजरात हाईकोर्ट ने वकील के खिलाफ हत्या के प्रयास की FIR रद्द की
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गुजरात हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में हत्या के प्रयास और आपराधिक साजिश जैसे गंभीर आरोपों वाली FIR को एक अधिवक्ता के खिलाफ रद्द कर दिया। अदालत ने पाया कि जांच के दौरान प्राप्त सीसीटीवी फुटेज शिकायतकर्ता के मुख्य आरोपों का समर्थन नहीं करती और रिकॉर्ड पर ऐसा कोई स्वतंत्र साक्ष्य नहीं है जो अधिवक्ता को कथित अपराध से जोड़ता हो।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला दिसंबर 2019 में सूरत के रांदर पुलिस स्टेशन में दर्ज एक FIR से जुड़ा है। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि सूरत जिला अदालत परिसर में उसकी मुलाकात अधिवक्ता मोहम्मद बिलाल गुलाम रसूल कागज़ी से हुई, जिन्होंने उसे पहले दर्ज एक मामले को वापस लेने की धमकी दी। शिकायतकर्ता का यह भी आरोप था कि उसी दिन बाद में उस पर हमला किया गया, जिसमें उसे गंभीर चोटें आईं।

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FIR में कहा गया था कि अधिवक्ता ने अन्य आरोपियों के साथ मिलकर आपराधिक साजिश रची और हमले में भूमिका निभाई। इसी आधार पर उनके खिलाफ हत्या के प्रयास, गंभीर चोट पहुंचाने, आपराधिक धमकी और आपराधिक साजिश सहित कई धाराएं लगाई गई थीं।

हालांकि, अधिवक्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए दावा किया कि उन्हें केवल इसलिए झूठा फंसाया गया क्योंकि वे एक अन्य मामले में आरोपियों में से एक का प्रतिनिधित्व कर रहे थे।

मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति पी. एम. रावल ने जांच रिकॉर्ड और सीसीटीवी फुटेज का विस्तार से परीक्षण किया। अदालत ने पाया कि जिस समय और स्थान पर शिकायतकर्ता ने धमकी दिए जाने का आरोप लगाया था, उस समय अधिवक्ता वहां मौजूद ही नहीं थे।

अदालत ने कहा, “जांच एजेंसी द्वारा एकत्रित सीसीटीवी फुटेज शिकायतकर्ता के उस दावे को गलत साबित करती है कि सुबह 10 बजे अदालत परिसर में आवेदक ने उसे धमकी दी थी।”

राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि आपराधिक साजिश का आरोप ट्रायल के दौरान परखा जाना चाहिए और इस संबंध में सह-आरोपियों के बयानों तथा फोन कॉल रिकॉर्ड का हवाला दिया गया। लेकिन अदालत ने कहा कि किसी वकील का अपने मुवक्किल से फोन पर संपर्क होना अपने आप में आपराधिक साजिश का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि सह-आरोपियों के कथित बयानों के अलावा ऐसा कोई स्वतंत्र या पुष्टिकरण साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि अधिवक्ता किसी अवैध योजना या समझौते का हिस्सा थे।

अदालत ने माना कि जांच के दौरान सामने आए सीसीटीवी साक्ष्य शिकायतकर्ता के मुख्य आरोप को ही कमजोर कर देते हैं। साथ ही, रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस और स्वतंत्र साक्ष्य नहीं था जिससे अधिवक्ता की कथित भूमिका स्थापित हो सके।

न्यायालय ने कहा कि ऐसे हालात में उनके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने अधिवक्ता मोहम्मद बिलाल गुलाम रसूल कागज़ी के खिलाफ दर्ज FIR और उससे संबंधित सभी कार्यवाहियों को रद्द कर दिया।

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अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसके निष्कर्ष केवल याचिकाकर्ता अधिवक्ता तक सीमित हैं और शेष आरोपियों के खिलाफ चल रही जांच या मुकदमे पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

Case Details:

Case Title: Mohammad Bilal Ghulam Rasul Kagazi v. State of Gujarat & Anr.

Case Number: R/Criminal Misc. Application No. 211 of 2020

Judge: Justice P. M. Raval

Decision Date: 19 June 2026

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