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मजिस्ट्रेट सरोगेसी पात्रता प्रमाणपत्र की दोबारा जांच नहीं कर सकता: मद्रास हाईकोर्ट ने दंपति की याचिका बहाल कर ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द किया

Shivam Y.

मद्रास हाईकोर्ट ने कहा कि सरोगेसी मामलों में मजिस्ट्रेट पात्रता प्रमाणपत्र की वैधता की दोबारा जांच नहीं कर सकता और दंपति की याचिका पर नए सिरे से सुनवाई का आदेश दिया। - श्री नंदिनी देवी @ श्रीनंदिनी देवी सरवनन और अन्य बनाम तमिलनाडु राज्य और अन्य

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मजिस्ट्रेट सरोगेसी पात्रता प्रमाणपत्र की दोबारा जांच नहीं कर सकता: मद्रास हाईकोर्ट ने दंपति की याचिका बहाल कर ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द किया
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मद्रास हाईकोर्ट ने सरोगेसी (Surrogacy) से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम, 2021 के तहत सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी पात्रता प्रमाणपत्र (Eligibility Certificate) की वैधता पर मजिस्ट्रेट दोबारा फैसला नहीं दे सकता। अदालत ने कहा कि मजिस्ट्रेट की भूमिका केवल बच्चे की अभिभावकता (Parentage) और अभिरक्षा (Custody) से जुड़े आदेश तक सीमित है।

न्यायमूर्ति शमीम अहमद ने नामक्कल के न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा पारित आदेश को रद्द करते हुए मामले को नए सिरे से सुनवाई के लिए वापस भेज दिया।

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मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता श्री नंदिनी देवी और उनके पति सरवनन का इकलौता बेटा वर्ष 2024 में हृदयाघात के कारण चल बसा था। इसके बाद दंपति ने सरोगेसी के माध्यम से संतान प्राप्त करने का निर्णय लिया। पहली याचिकाकर्ता का गर्भाशय चिकित्सा कारणों से हटाया जा चुका था, इसलिए वह स्वयं गर्भधारण करने में सक्षम नहीं थीं।

सभी आवश्यक चिकित्सीय जांच के बाद संबंधित प्राधिकरण ने दंपति और सरोगेट मां दोनों को पात्रता प्रमाणपत्र जारी कर दिया। इसके बाद दंपति ने सरोगेसी अधिनियम के तहत बच्चे की अभिभावकता और अभिरक्षा संबंधी आदेश के लिए न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन दायर किया।

हालांकि, मजिस्ट्रेट ने यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि पहली याचिकाकर्ता निर्धारित आयु सीमा से अधिक थीं और सरोगेट मां के पति का बयान दर्ज नहीं किया गया था।

हाईकोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट ने अपने अधिकार क्षेत्र से आगे बढ़कर पात्रता प्रमाणपत्र की वैधता की समीक्षा की, जबकि ऐसा करने का अधिकार उसे कानून नहीं देता।

पीठ ने कहा,

"मजिस्ट्रेट जिला मेडिकल बोर्ड या सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी प्रमाणपत्रों के खिलाफ अपीलीय प्राधिकारी की तरह कार्य नहीं कर सकता।"

अदालत ने कहा कि सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी प्रमाणपत्रों को तब तक वैध माना जाएगा, जब तक किसी सक्षम मंच द्वारा उन्हें अवैध, धोखाधड़ीपूर्ण या अधिकार क्षेत्र से बाहर जारी किया गया घोषित न किया जाए।

आयु सीमा के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने कहा कि यदि कोई महिला 50 वर्ष पूरी कर चुकी है लेकिन अभी 51 वर्ष की नहीं हुई है, तो वह अधिनियम के तहत निर्धारित आयु सीमा के भीतर मानी जाएगी।

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पीठ ने माना कि पहली याचिकाकर्ता को जारी किया गया पात्रता प्रमाणपत्र पूरी तरह वैध था और केवल 50 वर्ष से अधिक आयु होने के आधार पर उसे अमान्य नहीं ठहराया जा सकता।

अदालत ने मजिस्ट्रेट के दूसरे आधार को भी अस्वीकार कर दिया।

पीठ ने कहा,

"अधिनियम में कहीं भी यह अनिवार्य नहीं किया गया है कि सरोगेट मां के पति का बयान दर्ज किया जाए।"

अदालत ने स्पष्ट किया कि सरोगेट मां के पति की सहमति पहले ही पात्रता प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया के दौरान सक्षम प्राधिकारी द्वारा जांची जाती है। इसलिए मजिस्ट्रेट के समक्ष उसकी अलग से गवाही आवश्यक नहीं है।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि इस प्रकार की कार्यवाही विरोधी पक्षों के बीच मुकदमा नहीं बल्कि बच्चे के हित और वैधानिक प्रक्रिया सुनिश्चित करने वाली कल्याणकारी कार्यवाही है।

मद्रास हाईकोर्ट ने आपराधिक पुनरीक्षण याचिका स्वीकार करते हुए नामक्कल के न्यायिक मजिस्ट्रेट का 18 मार्च 2026 का आदेश रद्द कर दिया और मामले को नए सिरे से विचार के लिए वापस भेज दिया।

अदालत ने याचिकाकर्ताओं को पात्रता प्रमाणपत्र के नवीनीकरण के लिए आवेदन करने का निर्देश दिया। साथ ही सक्षम प्राधिकारी को दो सप्ताह के भीतर नया प्रमाणपत्र जारी करने और उसके बाद ट्रायल कोर्ट को चार सप्ताह के भीतर कानून के अनुसार नया आदेश पारित करने का निर्देश दिया।

इसके अतिरिक्त, हाईकोर्ट ने रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया कि यह निर्णय राज्य के सभी प्रधान जिला न्यायाधीशों को भेजा जाए ताकि सरोगेसी से जुड़े मामलों में एक समान न्यायिक प्रक्रिया अपनाई जा सके।

Case Details

Case Title: Sri Nandhini Devi @ Srinandhini Devi Saravanan & Others v. State of Tamil Nadu & Others

Case Number: CRL RC No. 950 of 2026

Judge: Justice Shamim Ahmed

Decision Date: 25 June 2026

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