मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने एक महत्वपूर्ण आदेश में कहा है कि किसी महिला की तस्वीरों को मॉर्फ कर अश्लील सामग्री बनाना और उसे सोशल मीडिया पर प्रसारित करना केवल ऑनलाइन शरारत नहीं, बल्कि उसकी निजता, प्रतिष्ठा और गरिमा पर गंभीर हमला है। अदालत ने दिंडीगुल पुलिस को शिकायत पर तत्काल कार्रवाई करने, डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखने और आवश्यक होने पर एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया है।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता आर. रमेश कुमार ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए बताया कि उनकी बहन सिंगापुर में घरेलू सहायिका के रूप में कार्यरत हैं। आरोप है कि उनकी तस्वीरों को मॉर्फ कर अश्लील फोटो और वीडियो तैयार किए गए तथा इंस्टाग्राम सहित विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रसारित किया गया।
याचिका के अनुसार, परिवार को बाद में पता चला कि कुछ निजी व्यक्तियों की इसमें कथित भूमिका है। आरोप यह भी है कि कथित तौर पर उन लोगों ने मॉर्फ्ड सामग्री हटाने के बदले पैसे की मांग की। जब यह मांग पूरी नहीं की गई तो कथित रूप से आपत्तिजनक सामग्री का प्रसार जारी रखा गया।
याचिकाकर्ता ने कहा कि 20 मार्च 2026 को पुलिस अधिकारियों को शिकायत देने के बावजूद कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट से हस्तक्षेप की मांग की।
न्यायमूर्ति एल. विक्टोरिया गौरी ने कहा कि इस प्रकार के साइबर अपराधों को साधारण निजी विवाद या सोशल मीडिया की गलतफहमी मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
अदालत ने कहा, "मॉर्फ की गई तस्वीर कोई हानिरहित डिजिटल शरारत नहीं है। यह किसी महिला की निजता, प्रतिष्ठा और भावनात्मक सुरक्षा पर सुनियोजित हमला है।"
कोर्ट ने यह भी कहा कि साइबर अपराधों में समय पर कार्रवाई बेहद आवश्यक है क्योंकि डिजिटल साक्ष्य बहुत जल्दी नष्ट हो सकते हैं।
पीठ ने कहा, "साइबर अपराधों में देरी अक्सर साक्ष्यों के लिए घातक साबित होती है। यूआरएल हट सकते हैं, अकाउंट डिलीट हो सकते हैं और आईपी लॉग ओवरराइट हो सकते हैं।"
अदालत ने स्पष्ट किया कि वह इस चरण पर आरोपों की सत्यता पर कोई राय व्यक्त नहीं कर रही है, लेकिन शिकायत प्रथम दृष्टया गंभीर संज्ञेय अपराधों की ओर संकेत करती है, इसलिए पुलिस का कर्तव्य है कि वह कानून के अनुसार तुरंत कार्रवाई करे।
कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल इसलिए कि पीड़िता विदेश में रह रही है, भारतीय कानून प्रवर्तन एजेंसियों की जिम्मेदारी समाप्त नहीं हो जाती, यदि मामले का एक हिस्सा भारत के अधिकार क्षेत्र से जुड़ा हो।
मद्रास हाईकोर्ट ने याचिका का निस्तारण करते हुए द्वितीय प्रतिवादी पुलिस अधिकारी को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता की शिकायत का तत्काल सत्यापन करें और उपलब्ध सभी डिजिटल साक्ष्यों - जैसे स्क्रीनशॉट, यूआरएल, सोशल मीडिया अकाउंट, कॉल रिकॉर्ड, संदेश और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामग्री की जांच करें।
अदालत ने कहा कि यदि जांच में किसी संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है तो सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 तथा भारतीय न्याय संहिता, 2023 के उपयुक्त प्रावधानों के तहत तुरंत एफआईआर दर्ज कर विधि अनुसार जांच की जाए।
इसके अलावा पुलिस को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से संबंधित अकाउंट विवरण, आईपी लॉग और अन्य इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड सुरक्षित रखने तथा यदि आपत्तिजनक सामग्री ऑनलाइन उपलब्ध हो तो कानून के अनुसार उसे हटाने या ब्लॉक कराने के लिए आवश्यक कदम उठाने का भी निर्देश दिया गया।
कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि आवश्यकता पड़ने पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग या अन्य वैधानिक माध्यम से पीड़िता का बयान दर्ज किया जाए। साथ ही पुलिस अधीक्षक को जांच की प्रगति की निगरानी करने और पूरी प्रक्रिया यथासंभव चार सप्ताह के भीतर पूरी करने को कहा गया।
हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि उसने निजी प्रतिवादियों के विरुद्ध लगाए गए आरोपों के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं की है और जांच स्वतंत्र, निष्पक्ष तथा कानून के अनुसार ही आगे बढ़ाई जाएगी।
Case Details
Case Title: R. Ramesh Kumar v. The Superintendent of Police & Others
Case Number: W.P.Crl.(MD) No. 2027 of 2026
Judge: Justice L. Victoria Gowri
Decision Date: 08 June 2026












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