मद्रास हाई कोर्ट की पांच न्यायाधीशों की बड़ी पीठ ने कैदियों के अधिकारों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में अंतरिम आदेश पारित करते हुए कहा है कि केवल इस आधार पर कि दोषसिद्धि के खिलाफ अपील लंबित है, किसी दोषी कैदी को तमिलनाडु सस्पेंशन ऑफ सेंटेंस रूल्स, 1982 के तहत साधारण (Ordinary Leave) या आपातकालीन (Emergency Leave) अवकाश मांगने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जब तक इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट अंतिम निर्णय नहीं दे देता, तब तक जेल प्रशासन इन नियमों के तहत प्राप्त होने वाले अवकाश आवेदनों पर विचार करता रहेगा।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला मद्रास हाई कोर्ट की दो पूर्ण पीठों (Full Benches) के परस्पर विरोधी फैसलों के कारण बड़ी पीठ के समक्ष आया था। मुख्य प्रश्न यह था कि यदि किसी दोषी कैदी की सजा के विरुद्ध अपील हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में लंबित हो, तो क्या उसे तमिलनाडु सस्पेंशन ऑफ सेंटेंस रूल्स, 1982 के तहत अस्थायी अवकाश दिया जा सकता है।
साथ ही, अदालत के समक्ष यह भी प्रश्न था कि सुप्रीम कोर्ट के समक्ष लंबित मुकेश कुमार मामले के निर्णय तक राज्य में ऐसी याचिकाओं का निस्तारण किस आधार पर किया जाए।
पीठ ने कहा कि जेल में बंद होने मात्र से किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकार समाप्त नहीं हो जाते। संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रत्येक व्यक्ति को गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार प्राप्त है और यह अधिकार दोषी कैदियों पर भी लागू होता है।
अदालत ने यह भी कहा कि 1982 के नियमों में केवल उन कैदियों को अवकाश देने पर रोक है जिनका मुकदमा अभी विचाराधीन (Pending Trial) है। वहीं, जिन व्यक्तियों को दोषी ठहराया जा चुका है और जिनकी अपील लंबित है, उनके संबंध में ऐसा कोई स्पष्ट प्रतिबंध नहीं है।
पीठ ने कहा, "अस्थायी अवकाश और अस्थायी रिहाई मानव गरिमा का हिस्सा हैं। केवल इसलिए कि न्यायिक अपील लंबित है, इन अधिकारों को अनिश्चितकाल तक रोका नहीं जा सकता।"
अदालत ने K.M. नानावटी मामले के फैसले का भी उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि वह निर्णय अलग परिस्थितियों में दिया गया था और उसे तमिलनाडु सस्पेंशन ऑफ सेंटेंस रूल्स, 1982 के तहत मिलने वाले वैधानिक अवकाश पर स्वतः लागू नहीं माना जा सकता।
पीठ ने कहा कि सीमित अवधि के लिए दिया जाने वाला अवकाश अपीलीय अदालत के उस अधिकार में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करता, जिसके तहत वह सजा निलंबित करने या न करने का निर्णय लेती है।
अदालत ने अपने अंतरिम आदेश में कहा कि T. रामलक्ष्मी बनाम राज्य का पूर्ण पीठ का निर्णय फिलहाल प्रभावी रहेगा और उसी के आधार पर अवकाश संबंधी मामलों का निस्तारण किया जाएगा।
इसके साथ ही, अदालत ने उस पूर्व आदेश के संचालन पर रोक लगा दी, जिसमें रजिस्ट्री को साधारण या आपातकालीन अवकाश संबंधी याचिकाएं स्वीकार करने से मना किया गया था।
पीठ ने राज्य के सभी सक्षम जेल अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे प्रत्येक आवेदन का उसके तथ्यों और 1982 के नियमों के अनुसार स्वतंत्र रूप से परीक्षण करें। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि K.M. नानावटी का निर्णय इस अंतरिम अवधि में अवकाश आवेदन पर विचार करने से रोकने वाला स्वतः लागू होने वाला प्रतिबंध नहीं माना जाएगा।
मद्रास हाई कोर्ट ने अंतरिम रूप से निर्देश दिया कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा व्यापक कानूनी प्रश्नों पर अंतिम निर्णय दिए जाने तक तमिलनाडु सस्पेंशन ऑफ सेंटेंस रूल्स, 1982 के तहत साधारण और आपातकालीन अवकाश संबंधी आवेदन स्वीकार किए जाएंगे और उनका निस्तारण T. रामलक्ष्मी मामले में निर्धारित सिद्धांतों के अनुसार किया जाएगा।
इसके बाद संबंधित रिट याचिकाओं को आगे की कार्यवाही के लिए संबंधित डिवीजन बेंच के समक्ष सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया गया।
Case Details
Case Title: Sheefa Rani v. Secretary to Government of Tamil Nadu & Others (along with connected matters)
Case Number: W.P. (Crl.) Nos. 722, 1167, 1244 & 1321 of 2025
Judge: Chief Justice Sushrut Arvind Dharmadhikari, Justice C.V. Karthikeyan, Justice A.D. Jagadish Chandira, Justice M. Nirmal Kumar and Justice Sunder Mohan
Decision Date: 19 June 2026
















