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मद्रास हाई कोर्ट ने कहा- नाबालिग की सहमति की कोई कानूनी अहमियत नहीं; POCSO दोषसिद्धि बरकरार, उम्रकैद घटाकर 10 साल की

Shivam Y.

मद्रास हाईकोर्ट ने POCSO मामले में दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए उम्रकैद की सजा घटाकर 10 साल की। आरोपी को SC/ST एक्ट और आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोपों से बरी किया गया। - अरुमुगम बनाम डिप्टी सुपरिटेंडेंट ऑफ़ पुलिस और अन्य।

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मद्रास हाई कोर्ट ने कहा- नाबालिग की सहमति की कोई कानूनी अहमियत नहीं; POCSO दोषसिद्धि बरकरार, उम्रकैद घटाकर 10 साल की
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मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में POCSO कानून के तहत दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए आरोपी को दी गई शेष प्राकृतिक जीवन तक की उम्रकैद की सजा को घटाकर 10 वर्ष के कठोर कारावास में बदल दिया है। साथ ही अदालत ने SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम और आत्महत्या के प्रयास के लिए उकसाने से जुड़े आरोपों में आरोपी को बरी कर दिया।

यह फैसला न्यायमूर्ति एन. आनंद वेंकटेश और न्यायमूर्ति के.के. रामकृष्णन की खंडपीठ ने 15 जून 2026 को सुनाया।

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मामले की पृष्ठभूमि

अभियोजन के अनुसार पीड़िता अनुसूचित जाति समुदाय से थी और आरोपी से उसकी पहचान कई वर्षों से थी। जब पीड़िता नाबालिग थी, तब दोनों के बीच संबंध बने। आरोप था कि आरोपी ने विवाह का वादा कर उसके साथ कई बार शारीरिक संबंध बनाए, जिसके परिणामस्वरूप वह गर्भवती हो गई और बाद में उसने एक बच्ची को जन्म दिया।

मामले की जांच के दौरान डीएनए परीक्षण कराया गया, जिसमें आरोपी को बच्चे का जैविक पिता पाया गया। इसके आधार पर पुलिस ने POCSO अधिनियम, SC/ST एक्ट और भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत आरोप लगाए।

अपील में आरोपी की ओर से यह तर्क दिया गया कि अभियोजन पक्ष पीड़िता की उम्र साबित करने में असफल रहा है। हालांकि हाईकोर्ट ने जन्म प्रमाणपत्र और स्कूल रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद इस दलील को खारिज कर दिया।

अदालत ने माना कि पीड़िता की जन्म तिथि 18 मई 2003 थी और घटना के समय उसकी आयु 18 वर्ष से कम थी। इसलिए वह POCSO अधिनियम के तहत “बालिका” की श्रेणी में आती है।

बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि दोनों के बीच प्रेम संबंध था और शारीरिक संबंध आपसी सहमति से बने थे। इस पर अदालत ने स्पष्ट किया कि नाबालिग की सहमति को कानून मान्यता नहीं देता।

खंडपीठ ने कहा, “18 वर्ष से कम आयु का बच्चा कानून की नजर में वैध सहमति देने में सक्षम नहीं है।” अदालत ने यह भी जोड़ा कि प्रेम संबंध होने के बावजूद यदि पीड़ित पक्ष नाबालिग है तो POCSO कानून लागू होगा।

हाईकोर्ट ने SC/ST एक्ट के तहत दर्ज आरोपों की भी विस्तार से जांच की। अदालत ने पाया कि आरोपी और पीड़िता के बीच संबंध लंबे समय से थे और उनका आधार जाति नहीं था।

पीठ ने कहा कि रिकॉर्ड से यह स्पष्ट है कि दोनों के बीच संबंध स्वाभाविक आकर्षण के कारण बने थे। ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला जिससे यह साबित हो कि अपराध केवल इसलिए किया गया क्योंकि पीड़िता अनुसूचित जाति समुदाय से थी।

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अदालत ने कहा कि SC/ST एक्ट की संबंधित धाराओं को लागू करने के लिए यह साबित होना जरूरी है कि अपराध पीड़ित की जातीय पहचान के कारण किया गया हो। चूंकि इस मामले में ऐसा कोई आधार नहीं मिला, इसलिए आरोपी को SC/ST एक्ट के दोनों आरोपों से बरी कर दिया गया।

अभियोजन का आरोप था कि जब पीड़िता ने विवाह की मांग की तो आरोपी ने उसे “जाकर मर जाने” के लिए कहा, जिसके बाद उसने कथित रूप से जहर खाकर आत्महत्या का प्रयास किया।

हालांकि हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसा कथन अपने आप में आत्महत्या के लिए उकसाने के कानूनी मानदंड को पूरा नहीं करता। अदालत ने यह भी नोट किया कि मेडिकल साक्ष्यों में कई संदेह मौजूद थे और यह पूरी तरह साबित नहीं हो सका कि पीड़िता ने वास्तव में जहर का सेवन किया था।

अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपी द्वारा जानबूझकर आत्महत्या के लिए प्रेरित करने या उकसाने का आरोप सिद्ध नहीं कर सका। इसलिए इस आरोप में भी आरोपी को राहत दी गई।

हाईकोर्ट ने POCSO अधिनियम के तहत दोषसिद्धि को बरकरार रखा, लेकिन सजा पर पुनर्विचार किया। अदालत ने कहा कि जिस संशोधन के आधार पर ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को शेष प्राकृतिक जीवन तक की उम्रकैद दी थी, वह संशोधन घटना के बाद लागू हुआ था।

पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 20(1) का हवाला देते हुए कहा कि किसी व्यक्ति को उस समय लागू कानून से अधिक कठोर सजा नहीं दी जा सकती, जब अपराध किया गया था।

अदालत ने आरोपी की आयु, दोनों के बीच लंबे समय से चले आ रहे संबंध और मामले की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए माना कि दी गई उम्रकैद अत्यधिक कठोर थी।

हाईकोर्ट ने आपराधिक अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए आरोपी को SC/ST एक्ट की धाराओं तथा आत्महत्या के प्रयास के लिए उकसाने के आरोप से बरी कर दिया।

हालांकि अदालत ने POCSO अधिनियम के तहत दोषसिद्धि को बरकरार रखा और सजा को संशोधित करते हुए 10 वर्ष के कठोर कारावास तथा 5,000 रुपये के जुर्माने तक सीमित कर दिया। जुर्माना अदा न करने पर एक वर्ष का साधारण कारावास भुगतना होगा।

Case Details

Case Title: Arumugam v. The Deputy Superintendent of Police & Anr.

Case Number: Crl.A.(MD) No.125 of 2024

Judges: Justice N. Anand Venkatesh and Justice K. K. Ramakrishnan

Decision Date: 15 June 2026

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