मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि पत्नी द्वारा पुलिस में शिकायत दर्ज कराना अपने आप में मानसिक क्रूरता (Mental Cruelty) नहीं माना जा सकता, जब तक यह साबित न हो जाए कि शिकायत झूठी या दुर्भावनापूर्ण थी।
न्यायमूर्ति पी. वडामलाई ने पति की दूसरी अपील को खारिज करते हुए निचली अदालतों के उन फैसलों को बरकरार रखा, जिनमें पति की तलाक याचिका पहले ही खारिज कर दी गई थी।
मामले की पृष्ठभूमि
पति और पत्नी का विवाह 13 फरवरी 2011 को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था। विवाह के बाद दोनों हैदराबाद में रहने लगे और उनके यहां एक पुत्र का जन्म हुआ।
पति का आरोप था कि पत्नी का व्यवहार शुरू से ही झगड़ालू था और वह वैवाहिक जीवन में रुचि नहीं लेती थी। उसके अनुसार, पत्नी ने कई बार विवाद किए, उसे अपमानित किया और अगस्त 2012 में वैवाहिक घर छोड़कर चली गई।
पति ने यह भी दावा किया कि पत्नी ने उसके और उसके परिवार के खिलाफ पुलिस शिकायतें दर्ज कराईं, जिससे उसे मानसिक पीड़ा हुई। इन्हीं आरोपों के आधार पर उसने क्रूरता और परित्याग (Desertion) के आधार पर तलाक की मांग की।
दूसरी ओर, पत्नी ने इन आरोपों से इनकार किया। उसका कहना था कि उसे दहेज की मांग और उत्पीड़न का सामना करना पड़ा, जिसके कारण उसने पुलिस और संबंधित अधिकारियों से संपर्क किया। उसने यह भी कहा कि वह वैवाहिक संबंध बनाए रखने के लिए हमेशा तैयार रही है।
हाईकोर्ट में पति की ओर से दलील दी गई कि पत्नी द्वारा दर्ज कराई गई आपराधिक शिकायतों ने उसे और उसके परिवार को गंभीर मानसिक तनाव पहुंचाया।
उसके वकील ने कहा कि दोनों पक्ष कई वर्षों से अलग रह रहे हैं और वैवाहिक संबंध पूरी तरह टूट चुके हैं। इसलिए विवाह को जारी रखने का कोई औचित्य नहीं है।
पति ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें झूठी और मानहानिकारक शिकायतों को मानसिक क्रूरता माना गया था।
न्यायालय ने रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद पाया कि पति अपने आरोपों को साबित करने में असफल रहा।
अदालत ने कहा कि पति ने यह साबित करने के लिए कोई स्वतंत्र गवाह पेश नहीं किया कि पत्नी ने उसके साथ कथित रूप से दुर्व्यवहार किया या पड़ोसियों के सामने उसे अपमानित किया।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि पति यह साबित नहीं कर सका कि पत्नी द्वारा दर्ज कराई गई शिकायतें झूठी थीं।
अदालत ने नोट किया कि पत्नी ने अपने दावों के समर्थन में मेडिकल रिकॉर्ड, पुलिस शिकायतों की रसीदें और सामाजिक कल्याण विभाग से संबंधित दस्तावेज पेश किए थे। वहीं पति इन दस्तावेजों को प्रभावी ढंग से चुनौती नहीं दे सका।
फैसले में अदालत ने कहा:
“यदि पत्नी अपने अधिकारों की रक्षा के लिए कानूनी कार्यवाही शुरू करती है, तो केवल उसी आधार पर उसे मानसिक क्रूरता नहीं कहा जा सकता।”
अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति द्वारा अपने अधिकारों की सुरक्षा के लिए उठाए गए कानूनी कदमों को केवल इसलिए क्रूरता नहीं माना जा सकता क्योंकि उससे दूसरे पक्ष को असुविधा हुई हो।
इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने माना कि पति न तो क्रूरता और न ही परित्याग का आधार साबित कर सका।
अदालत ने पति की सिविल मिसलेनियस सेकंड अपील खारिज कर दी और थंजावुर की निचली अदालतों द्वारा पारित आदेशों को बरकरार रखा। मामले में किसी भी पक्ष को लागत (Costs) नहीं दी गई।
Case Details
Case Title: R.J. Sathish Kumar v. Nisha Priya
Case Number: C.M.S.A. (MD) No. 55 of 2021
Judge: Justice P. Vadamalai
Decision Date: 08 June 2026
















