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महिला वादकारी की सुविधा को प्राथमिकता देना न्याय के हित में आवश्यक, आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने चेक बाउंस केस नेल्लोर ट्रांसफर किया

Shivam Y.

आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने चेक बाउंस का एक मामला नेल्लोर ट्रांसफर कर दिया। कोर्ट ने कहा कि न्याय के हित में ट्रांसफर याचिकाओं पर फैसला करते समय, महिला वादी की कठिनाई और सुविधा का ध्यान रखा जाना चाहिए। - मेकाला सिंधु प्रिया बनाम आंध्र प्रदेश राज्य और अन्य

महिला वादकारी की सुविधा को प्राथमिकता देना न्याय के हित में आवश्यक, आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने चेक बाउंस केस नेल्लोर ट्रांसफर किया
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आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने कहा है कि किसी आपराधिक मामले के स्थानांतरण (ट्रांसफर) पर फैसला करते समय अदालतों को केवल तकनीकी पहलुओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि न्याय के व्यापक हित और पक्षकारों की वास्तविक कठिनाइयों पर भी विचार करना चाहिए। विशेष रूप से महिला वादकारी की सुविधा और उसे होने वाली परेशानी को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

इसी सिद्धांत को लागू करते हुए हाई कोर्ट ने सुल्लूरपेट में लंबित एक चेक बाउंस मामले को नेल्लोर स्थानांतरित करने का आदेश दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता मेकला सिंधु प्रिया के खिलाफ परक्राम्य लिखत अधिनियम (Negotiable Instruments Act) की धारा 138 के तहत C.C. नंबर 111/2024 सुल्लूरपेट की अतिरिक्त न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी की अदालत में लंबित है।

याचिकाकर्ता ने पहले प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश, नेल्लोर के समक्ष मामले को नेल्लोर स्थानांतरित करने की मांग की थी। हालांकि, सत्र न्यायालय ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि उसे धारा 142(2) एनआई एक्ट के तहत क्षेत्राधिकार (Jurisdiction) प्राप्त नहीं है।

हाई कोर्ट में याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि वह नेल्लोर की निवासी है और हर सुनवाई के लिए लगभग 100 किलोमीटर दूर सुल्लूरपेट जाना पड़ता है। यह भी बताया गया कि उसके और उसके पति के बीच कई अन्य मामले पहले से ही नेल्लोर की अदालतों में लंबित हैं। याचिका में यह भी कहा गया कि वर्तमान शिकायत उसके पति के एक करीबी सहयोगी के माध्यम से दायर कराई गई है तथा सुल्लूरपेट में पेशी के दौरान उसे सुरक्षा संबंधी आशंका भी है।

न्यायमूर्ति डॉ. वेंकटा ज्योतिर्मई प्रताप ने कहा कि सत्र न्यायालय ने केवल क्षेत्राधिकार के प्रश्न पर ध्यान दिया और याचिकाकर्ता द्वारा उठाई गई वास्तविक कठिनाइयों पर विचार ही नहीं किया।

अदालत ने कहा, "ट्रांसफर संबंधी अधिकार केवल प्रक्रियात्मक नहीं है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी पक्षकार को अनावश्यक कठिनाई का सामना न करना पड़े और न्याय के उद्देश्य प्रभावी रूप से पूरे हों।"

हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के अब्दुल नज़र मदनी बनाम तमिलनाडु राज्य फैसले का हवाला देते हुए कहा कि ट्रांसफर याचिकाओं पर निर्णय करते समय पक्षकारों की सुविधा, विशेषकर महिला वादकारी की सुविधा, एक ही स्थान पर लंबित मामलों का समुचित प्रबंधन तथा न्याय के समग्र हित महत्वपूर्ण कारक होते हैं।

अदालत ने यह भी कहा कि सत्र न्यायालय ने याचिकाकर्ता की यात्रा संबंधी कठिनाई, नेल्लोर में लंबित अन्य मामलों और उसकी सुरक्षा संबंधी आशंका जैसे महत्वपूर्ण तथ्यों पर कोई विचार नहीं किया। यह आदेश न्यायिक विवेक के उचित प्रयोग के अभाव को दर्शाता है।

सभी परिस्थितियों पर विचार करने के बाद हाई कोर्ट ने माना कि मामले को नेल्लोर स्थानांतरित करने से शिकायतकर्ता को कोई विशेष नुकसान नहीं होगा, जबकि याचिकाकर्ता को अनावश्यक कठिनाई से राहत मिलेगी।

इसी आधार पर अदालत ने आपराधिक पुनरीक्षण याचिका स्वीकार करते हुए 4 नवंबर 2025 को प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश, नेल्लोर द्वारा पारित आदेश को रद्द कर दिया। साथ ही, C.C. नंबर 111/2024 को सुल्लूरपेट की अतिरिक्त न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी की अदालत से स्थानांतरित कर द्वितीय अतिरिक्त न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, नेल्लोर की अदालत में भेजने का निर्देश दिया। लंबित अन्य आवेदन भी निस्तारित कर दिए गए।

Case Details

Case Title: Mekala Sindhu Priya v. State of Andhra Pradesh & Another

Case Number: Criminal Revision Case No. 194 of 2026

Judge: Hon'ble Dr. Justice Venkata Jyothirmai Pratapa

Decision Date: 29 April 2026

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